शुक्रवार, 18 मई 2018

चन्द माहिया : क़िस्त 43

चन्द माहिया : क़िस्त 43

:1:
जज्बात की सच्चाई
नापोगे कैसे
इस दिल की गहराई

:2:
तुम को सबकी है ख़बर
कौन छुपा तुम से
सब तेरी ज़ेर-ए-नज़र

:3:
इक तुम पे भरोसा था
टूट गया वो भी
कब मैने सोचा था

:4:
इतना जो मिटाया है
और मिटा देते
दम लब तक आया है

:5:
कितनी भोली सूरत
जैसे बनाई हो
ख़ुद रब ने ये मूरत

-आनन्द.पाठक-

शनिवार, 3 मार्च 2018

एक ग़ज़ल : ये कैसी रस्म-ए-उलफ़त है----

एक ग़ज़ल : ये कैसी रस्म-ए-उलफ़त है----

ये कैसी रस्म-ए-उलफ़त है ,न आँखें नम ,न रुसवाई
ज़माने को खटकता क्यों  है दो दिल की  पज़ीराई

तुम्हारे हाथ में पत्थर ,  जुनून-ए-दिल इधर भी है
न तुम जीते ,न दिल न हारा,मुहब्बत भी न रुक पाई

न भूला है ,न भूलेगा कभी यह आस्तान-ए-यार
मेरी शिद्दत ,मेरे सजदों की अन्दाज़-ए-जबींसाई

तुम्हारे सितम की मुझ पर अभी तो इन्तिहा बाक़ी
कभी देखा नहीं होगा , मेरी जैसी शिकेबाई

तुम्हारी तरबियत में ही कमी कुछ रह गई होगी
वगरना कौन करता है मुहब्ब्त की यूँ  रुसवाई

कभी जब ’मैं’ नहीं रहता ,तो बातें करती रहती हैं
उधर से कुछ तेरी यादें ,इधर से मेरी तनहाई

हमारी जाँ ब-लब है ,तुम अगर आ जाते इस जानिब
यक़ीनन देखते हम भी कि क्या होती मसीहाई

मैं मह्व-ए-यार में डूबा रहा ख़ुद से जुदा ’आनन’
मुझे होती ख़बर क्या कब ख़िज़ाँ आई ,बहार आई

-आनन्द.पाठक-

शब्दार्थ
पजीराई =चाहत ,स्वीकृति ,मक़्बूलियत
आस्तान-ए-यार = प्रेमिका के देहरी का चौखट/पत्थर
अन्दाज़-ए-जबींसाई = माथा रगड़ने का अन्दाज़./तरीक़ा
शिकेबाई      =धैर्य/धीरज/सहिष्णुता
तरबियत =पालन पोषण
जाँ-ब-लब =मरणासन्न स्थिति
मह्व-ए-यार = यार के ध्यान में मग्न /मुब्तिला

मंगलवार, 12 दिसंबर 2017

चन्द फ़र्द अश’आर

चन्द फ़र्द अश’आर

सुकून-ओ-चैन ज़ेर-ए-हुक्म  उनके आने जाने पे
वो आतें हैं तो आता है ,  नहीं आते ,  नहीं  आता
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वो चिराग़ लेके चला तो है ,मगर आँधियों का ख़ौफ़ भी
मैं सलामती की दुआ करूँ ,उसे हासिल-ए-महताब हो
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ज़माने की हज़ारों बन्दिशें क्यों फ़र्ज़ हो मुझ पर
अकेला मैं ही क्या ’आनन’ जो राह-ए-इश्क़ चलता हूँ ?
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तेरी उल्फ़त ज़ियादा तो मेरी उलफ़त है क्या कमतर
ज़ियादा-कम का मसला तो नहीं  होता है उलफ़त में
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अगर हो रूह में ख़ुशबू तो ख़ुद ही फैल जायेगी
ज़माने को दिखाना क्या , ज़माने को बताना क्या !
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हुस्न-ओ-जमाल यूँ तो इनायत ख़ुदा की है
उस हुस्न में दिखे  है  ख़ुदा का ज़ुहूर  भी
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अजब क्या चीज़ है ये नीद जो आंखों में बसती है
जब आना है तो आती है , नहीं आना ,नही आती
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जहाँ जहाँ पे पड़े थे तेरे क़दम ,जानम
वहीं वहीं पे झुकाते गए थे  सर अपने       
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खुद का चेहरा ख़ुद नज़र आता नहीं
जब तलक ना आइना  हो सामने 
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बचाता दिल को तो कैसे  बचाता  मैं ,’आनन’
बला की धार थी उसकी निगाह-ए-क़ातिल  में
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यूँ  जितना भी चाहो  दबे पाँव आओ
हवाओं की ख़ुशबू से पहचान लूँगा

अगर मेरे दिल से निकल कर दिखा दो
तो फिर हार अपनी चलो मान लूँगा
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राह-ए-उलफ़त तो नही  आसान है
दिल को तू पहले अभी शैदा तो कर

सिर्फ़  सजदे  में पड़ा  है  बेसबब 
इश्तियाक़-ए-इश्क़ भी पैदा  तो कर
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    तुझसे  ख़फ़ा  हूँ  ज़िन्दगी , तू  जानती भी  है
अब आ भी जा कि मुझ को मनाने की बात कर
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तुम्हारा रास्ता तुमको मुबारक हज़रत-ए-नासेह
अरे ! मैं रिन्द हूँ , पीर-ए-मुगां है ढूँढता  मुझको

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एक क़ता-----

भला होते मुकम्मल कब यहाँ पे इश्क़ के किस्से
कभी अफ़सोस मत करना कि हस्ती हार जाती है

पढ़ो ’फ़रहाद’ का किस्सा ,यकीं आ जायेगा तुम को
मुहब्बत में कभी ’तेशा’ भी बन कर मौत आती है

जो अफ़साना अधूरा था विसाल-ए-यार का ’आनन’
चलो बाक़ी सुना दो अब कि मुझको नीद आती है
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कुछ करो या मत करो ,इतना करो
है बची ग़ैरत अगर ,ज़िन्दा   करो

कौन देता है  किसी  को रास्ता
ख़ुद नया इक रास्ता  पैदा  करो

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जो मिले मुझ से चेहरे चढ़ाए थे ,वो
कोई मिलता नहीं  मुझ से मेरी तरह
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चाह अपनी कभी छुपा न सके
दाग़-ए-दिल भी उसे दिखा न सके
यार की आँख नम न हो-’आनन’
बात दिल की ज़ुबाँ पे ला न सके
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एक क़ता

खिड़कियाँ अब न खुलती किसी बात पर
आज इन्सानियत को ये क्या हो गया

लोग अपने ही थे  जिनके हाथों लुटे
उनकी आँखों के पानी को क्या हो गया

सब को हासिल हुई है इनायत तेरी
एक मुझको न हासिल तो क्या हो गया

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ढूँढने मैं चला वो कि शायद  मिले
आदमी ही कहीं बीच में खो  गया

जब कि मंजिल क़रीब आने वाली ही थी
दरमियान-ए-सफ़र ,रहनुमा  सो गया


ज़िन्दगी तुम से कोई शिकायत नहीं
प्यार से भी छुआ तो ये दिल रो गया


ये उजाला तेरे दर पे पहुँचा न हो
पर खुशी है कि तेरी गली तो गया
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मिला कर खाक में मुझ को ,भला अब पूछते हो क्या 
हुनर  कैसा  तुम्हारा और क्या   तक़दीर  थी मेरी

भरे थे रंग  कितने  ज़िन्दगी  में उम्र  भर  ’आनन’
जो वक़्त-ए-जाँ-ब लब  देखा ,फटी  तस्वीर थी मेरी
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महफ़िल में लोग आए थे अपनी अना के साथ
देखा नहीं किसी को भी ज़ौक़-ए-फ़ना  के साथ

नासेह ! तुम्हारी बात में नुक्ते की बात  है 
दिल लग गया है  मेरा किसी  आश्ना  के साथ
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भला होते मुकम्मल कब ज़हाँ में इश्क़ के किस्से 
कभी अफ़सोस मत करना कि हस्ती हार जाती है

जो अफ़साना अधूरा था ’विसाल-ए-यार’ का -आनन’
चलो बाक़ी सुना दो अब कि मुझको  नीद आती है
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ये माना तुम्हारे मुक़ाबिल न कोई
मगर इस का  मतलब ,ख़ुदा तो नहीं हो

बहुत लोग आए तुम्हारे ही जैसे
फ़ना हो गए,तुम जुदा तो नहीं हो
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ये शराफ़त थी हमारी ,आप की सुन गालियां
चुप रहे, हम भी सुनाते ,बेज़ुबां हम भी न थे
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गर हवाएँ सरकशी हों, क़ैद कर सकता है ’आनन’
इन्क़लाबी मुठ्ठियाँ तू , भींच कर ऐलान कर दे 
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मैं जैसा भी हूँ और जो भी बना हूँ
तुम्हारी ही तख़्लीक़ का आइना हूँ
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न आलिम,न मुल्ला,न उस्ताद ’आनन’
अदब से मुहब्बत ,अदब आश्ना हूँ
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मैं दरख़्त हूँ ,वो लगा गया ,मैं बड़ा हुआ ,वो चला गया
वो बसीर था जो भी ख़्वाब थे मेरी शाख़ शाख़ में जज़्ब है
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मेरा अहसास है ज़िन्दा तो राह-ए-रास्त है ’आनन’
वगरना इन अँधेरों में कहाँ से रोशनी मिलती
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तेरा होना ,नहीं होना ,भरम है तो भी अच्छा है
न तू होता तसव्वुर में , कहाँ फिर ज़िन्दगी मिलती
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मुहब्बत इक इनायत है  ख़ुदा की कारसाजी है
किसी को हुस्न जब देता ,वहीं इक दिल भी है गढ़ता

जुनून-ए-इश्क़ है तो फिर ख़िजाँ क्या है बहाराँ क्या
फ़ना होना ही जब हासिल ,शराईत कौन है पढ़ता

ये उलफ़त का जो दरिया है अजब उसकी सिफ़त’आनन’
जो चढ़ता है तो चढ़ता है ,नहीं चढ़ना ,नहीं चढ़ता
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कैसी वो कहानी थी ,सीने में छुपा रख्खा
तुमने जो सुनाई तो ,इक दर्द उभर आया
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क़ातिल निगाह उसकी ,मक़्तूल हूँ मैं ’आनन’
वो मुझसे पूछता है ,क़ातिल है कौन  मेरा ?
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देखा जो खुली आंखों, इक ख़्वाब था वो ’आनन’
कुछ और हक़ीक़त थी ,जब बन्द हुई आँखें
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      एक क़ता

खुशियाँ चली गई हैं  मुझे कब की छोड़ कर 
अब तुम भी साथ छोड़ने को कह रहे हो ,ख़ैर !

दो चार गाम चल के , गए  रास्ता बदल 
जीने को लोग जीते हैं  अपनों के भी बग़ैर 

रखना दुआ में याद कभी इस हक़ीर को 
जो आशना तुम्हारा जिसे कह रही हो ग़ैर

जिस मोड़ पर मिली थी ,वहीं मुन्तज़िर हूँ मै
काबा यहीं है मेरा यहीं आस्तान-ए-दैर 
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एक क़ता

नशा पैसे का हो या पद का, सर चढ़ बोलता है
बहक जाए कभी तो  राज़-ए-दिल भी खोलता है

बलन्दी आसमां  सी  है  मगर ईमान  बौना
जहाँ ज़र दिख गया  ईमान उसका डोलता है

ज़ुबाँ शीरी ,नरम लहजा , हलावत गुफ़्तगू  में
ज़ुबाँ जब खोलता है  तो हलाहिल घोलता है

नशा इतना कि इन्सां को नहीं इन्सां  समझता
हक़ीक़त ये कि खिड़की तक नहीं वो खोलता है
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तेरी शख़्सियत का मैं इक आईना हूँ
तो फिर क्यूँ अजब सी लगी ज़िन्दगी है

नहीं प्यास मेरी बुझी है अभी तक
अज़ल से लबों पर वही तिश्नगी है
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नासेहा, तेरा फ़लसफ़ा  नाक़ाबिल-ए-मंज़ूर है
क्या सच,यहाँ की हूर से,बेहतर वहाँ की हूर है ?
याँ सामने है मैकदा और तू  बना  है पारसा
फिर क्यों ख़याल-ए-जाम-ए-जन्नत से हुआ मख़्मूर है !
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ख़ुशियाँ तमाम लुट गईं है कू-ए-यार में
जैसे हरा था पेड़ कटा  हो बहार  में
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ख़ुशियाँ तमाम उम्र  मुझे ढूँढती रहीं
आकर भी मेरे घर पे ,बगल से गुज़र गईं
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क़ातिल के हक़ में लोग रिहाई में आ गए
अन्धे भी चश्मदीद  गवाही  में   आ गए


-anand pathak--







शनिवार, 14 अक्तूबर 2017

एक ग़ज़ल : मिलेगा जब वो हम से

 ग़ज़ल : मिलेगा जब भी वो हमसे---

मिलेगा जब भी वो हम से, बस अपनी ही सुनायेगा
मसाइल जो हमारे हैं  , हवा  में  वो   उड़ाएगा

अभी तो उड़ रहा है आस्माँ में ,उड़ने  दे उस को
कटेगी डॊर उस की तो ,कहाँ पर और जायेगा ?

सफ़र में हो गया तनहा ,तुम्हारे  साथ चल कर जो
वो यादों के चरागों को  जलायेगा  ,बुझायेगा

कहाँ तक खींच कर लाई ,तुझे यह ज़िन्दगी प्यारे
अगर तू लौटना चाहे , नहीं  तू  लौट पायेगा

इस आँगन का शजर है बस इसी उम्मीद में ज़िन्दा
परिन्दा जो गया है छोड़ , वापस लौट आयेगा

वो रिश्तों की लगाता बोलियाँ बाज़ार में जा कर
जिसे करनी तिजारत है वो रिश्ते क्या निभायेगा

अरे ! क्या सोचता रहता यहाँ पर बैठ कर ’आनन’
गये हैं लोग सब कुछ छोड़ ,तू  भी  छोड़ जायेगा 

-आनन्द.पाठक-

शुक्रवार, 6 अक्तूबर 2017

एक ग़ज़ल : छुपाते ही रहे अकसर---

एक ग़ज़ल : छुपाते ही रहे अकसर--

छुपाते ही रहे अकसर ,जुदाई के दो चश्म-ए-नम
जमाना पूछता गर ’क्या हुआ?’ तो क्या बताते हम

मज़ा ऐसे सफ़र का क्या,उठे बस मिल गई मंज़िल
न पाँवों में पड़े छाले  ,न आँखों  में  ही अश्क-ए-ग़म

न समझे हो न समझोगे ,  ख़ुदा की  यह इनायत है
बड़ी क़िस्मत से मिलता है ,मुहब्बत में कोई हमदम

हज़ारों सूरतें मुमकिन , हज़ारों  रंग भी मुमकिन
मगर जो अक्स दिल पर है किसी से भी नहीं है कम

ख़िजाँ का है अगर मौसम ,दिल-ए-नादाँ परेशां क्यूँ
सभी मौसम बदलता है  ,बदल जायेगा ये मौसम

नहीं देखा सुना होगा  ,जुनून-ए-इश्क़ क्या होता
कभी ’आनन’ से मिल लेना ,समझ जाओगे तुम जानम

-आनन्द.पाठक-

मंगलवार, 3 अक्तूबर 2017

एक ग़ज़ल : बहुत अब हो चुकी बातें---


ग़ज़ल : बहुत अब हो चुकी बातें------

बहुत अब हो चुकी बातें तुम्हारी ,आस्माँ की
उतर आओ ज़मीं पर बात करनी है ज़हाँ की

मसाइल और भी है ,पर तुम्हें फ़ुरसत कहाँ है
कहाँ तक हम सुनाएँ  दास्ताँ  अश्क-ए-रवाँ की

मिलाते हाथ हो लेकिन नज़र होती कहीं पर
कि हर रिश्ते में रहते सोचते  सूद-ओ-जियाँ की

सभी है मुब्तिला हिर्स-ओ-हसद में, खुद गरज हैं
यहाँ पर कौन सुनता है  अमीर-ए-कारवां  की

वही शोले हैं नफ़रत के ,वही फ़ित्नागरी  है
किसे अब फ़िक़्र है अपने वतन हिन्दोस्तां की

हमें मालूम है पानी कहाँ पर मर रहा  है
बचाना है हमें बुनियाद  पहले इस मकाँ  की

तुम्हारे दौर का ’आनन’ कहो कैसा चलन है?
वही मारा गया जो  बात करता है ईमाँ  की

-आनन्द.पाठक--

शब्दार्थ
मसाइल =समस्यायें
अश्क-ए-रवाँ = बहते हुए आँसू
सूद-ओ-ज़ियाँ = हानि-लाभ/फ़ायदा-नुक़सान
मुब्तिला =लिप्त
हिर्स-ओ-हसद= लोभ लालच इर्ष्या द्वेष
पित्नागरी = दंगा फ़साद

रविवार, 24 सितंबर 2017

एक ग़ज़ल :- ये गुलशन तो सभी का है---

एक ग़ैर रवायती ग़ज़ल :---ये गुलशन तो सभी का है----

ये गुलशन तो सभी का है ,तुम्हारा  है, हमारा है
लगा दे आग कोई  ये नही   हमको गवारा  है

तुम्हारा धरम है झूठा ,अधूरा है ये फिर मज़हब
ज़मीं को ख़ून से रँगने का गर मक़सद तुम्हारा है

यक़ीनन आँख का पानी तेरा अब मर चुका होगा
जलाना घर किसी का क्यूँ तेरा शौक़-ए-नज़ारा है?

सभी  तैयार बैठे हैं   डुबोने को मेरी कश्ती --
भँवर से बच निकलते हैं कि जब आता किनारा है

जो तुम खाते ’यहाँ’ की हो, मगर गाते ’वहाँ’ की हो
समझते हम भी हैं ’साहिब’!कहाँ किस का इशारा है

उठा कर फ़र्श से तुमको ,बिठाते हैं फ़लक पे हम
जो अपनी पे उतर आते ,जमीं पर भी उतारा है

ये मज़लूमों की बस्ती है ,यहाँ पर क़ैद हैं सपने
उठाते हाथ में परचम ,बदल जाता नज़ारा है

मुहब्बत की निशानी छोड़ कर जाना ,अगर जाना
कहाँ फिर लौट कर कोई कभी आता दुबारा है

यही तहज़ीब है मेरी ,यही है तरबियत ’आनन’
कि मेरी जान हाज़िर है किसी ने गर पुकारा है

-आनन्द पाठक-

शब्दार्थ
तरबियत  =पालन-पोषण