सोमवार, 14 अक्तूबर 2019

ग़ज़ल 127 : सब को अपनी अपनी पड़ी है---

21----121---121---122
बह्र-ए-मुतक़ारिब असरम मक़्बूज़  मक़्बूज़ सालिम

एक ग़ज़ल

सब को अपनी अपनी पड़ी है
मन-आँगन  दीवार  खड़ी  है

अच्छे दिन कैसे आएँगे  ?
सत्ता ही जब ख़ुद लँगड़ी  है

राह नुमाई  क्या करता ,वो
नाक़ाबिल है ,सोच सड़ी  है

कैसे उतरे चाँद  गगन  से ?
राहू-छाया द्वार  खड़ी   है

बिन व्याही बेटी के बापू
गिरवी में  रख्खी  पगड़ी  है

झूटे वादों से न बुझेगी
आग उदर की, भूख बड़ी है

सच पर पहरेदारी ’आनन’
पाँवों  में जंजीर पड़ी  है

-आनन्द.पाठक-

शुक्रवार, 13 सितंबर 2019

ग़ज़ल 126 : मैं अपना ग़म सुनाता हूँ

एक ग़ज़ल

मैं अपना ग़म सुनाता हूँ ,वो सुन कर मुस्कराते हैं
वो मेरी दास्तान-ए-ग़म को ही नाक़िस बताते हैं

बड़े मासूम नादाँ हैं  ,खुदा कुछ अक़्ल दे उनको
किसी ने कह दिया "लव यू" ,उसी पर जाँ लुटाते हैं

ख़ुशी अपनी जताते हैं ,हमें किन किन अदाओं से
हमारी ही ग़ज़ल खुद की बता, हमको सुनाते हैं

तुम्हारे सामने हूँ मैं , हटा लो यह निक़ाब-ए-रुख
कि ऐसे प्यार के मौसम कहाँ हर रोज़ आते हैं

गिला करते भला किस से ,तुम्हारी बेनियाज़ी का
यहाँ पर कौन सुनता है ,सभी अपनी सुनाते हैं

तसव्वुर में हमेशा ही तेरी तस्वीर रहती है
हज़ारों रंग भरते हैं, बनाते हैं , सजाते हैं

दिल-ए-सदचाक पर मेरे सितम कुछ और कर लेते
समझ जाते वफ़ा क्या चीज है , कैसे निभाते हैं

मुहब्बत का दिया रख दर पे उनके आ गया ’आनन’
कि अब यह देखना है वो बचाते  या बुझाते हैं

-आनन्द.पाठक--

शब्दार्थ
नाक़िस = बेकार ,व्यर्थ
दिल-ए-सद चाक = विदीर्ण हृदय

बुधवार, 11 सितंबर 2019

ग़ज़ल 125 : जान-ए-जानाँ से क्या माँगू---

2122-----1222
फ़ाअ’लातुन---मुफ़ाईलुन
बह्र-ए-मुशाकिल मुरब्ब: सालिम
-----------------------

ग़ज़ल :  जान-ए-जानाँ से क्या माँगू



जान-ए-जानां से  क्या  माँगू
दर्द-ए-दिल की दवा माँगू

हुस्न उनका क़यामत है
दाइमी की  दुआ  माँगू

क़ैद हूँ जुर्म-ए-उल्फ़त में
उम्र भर की सज़ा  माँगू

ज़िन्दगी भर नहीं  उतरे
इश्क़ का वह नशा माँगू

सादगी  से  मुझे  लूटा
वो ही तर्ज-ए-अदा माँगू

आप की बस इनायत हो
आप से और क्या माँगू

हमसफ़र आप सा ’आनन’
साथ मैं  आप का माँगू

-आनन्द.पाठक-

बुधवार, 4 सितंबर 2019

मुक्तक 05

              1 

ज़ह्र ही बस फ़िज़ा में घोलता  है
जब कभी हक़ में हमारे बोलता है
जो हरे थे जख़्म भरने लग गए थे
हर चुनावी दौर में वो खोलता है

सोमवार, 19 अगस्त 2019

फ़र्द शे’र 04

                1
1222--------1222-------1222-------1222
वही ख़ुशबख़्त है ’आनन’ ,मुहब्बत है जिसे हासिल
वगरना ज़िन्दगी तो उम्र भर  ग़मगीन   रहती  है

2
तेरी तसवीर को दुनिया से छुपा रखता हूँ
उस से तनहाई में फिर बात किया करता हूँ

4
1222---1222-----1222-----1222
मुहब्बत का दिया रख  दर पे उनके आ गया ’आनन’
यही अब देखना है वो बचाते या बुझाते  हैं


फ़र्द अश’आर 03


1
212---212----212----212—
जो कभी राज़दाँ थे ,हम उनके लिए
एक भूली हुई  दास्ताँ  हो गए
2
11212---11212---11212---11212
न तुझे मिला कोई हमसफ़र ,न मुझे मिला कोई हमज़ुबां
ये सफ़र तवील है ज़ीस्त का ,यही ज़िन्दगी की है दास्तां
3
122---1222----1222---1222
हमारा सफ़र बस यहीं तक था ’आनन’
तुम्हारा सफ़र जो भी बाक़ी  मुबारक


           4
कश्ती को डुबोने की ,साहिल पे है तैयारी
बगुलों की ,मछलियों  से  साजिश की तहत यारी
                    5
सुला कर हसरतें अपनी तेरे दर से गुज़रता हूँ
हज़ारों हसरतें फिर भी हैं दिल की ,जाग जाती हैं   
                    6
कौन सा है वो रिश्ता मेरा आप से 
मैने सोचा बहुत आप भी सोचिए

मैं मुहब्बत वफ़ा सब निभाता रहा
आप से कब निभाई गई सोचिए     
                    7
मैं मह्व-ए-यार में डूबी  हुई  ख़ुद से जुदा होकर
लिखूँ भी क्या लिखूँ दिल की उसे पढ़ना नहीं आता

अजब दीवानगी उसकी,नया राही मुहब्बत का
वफ़ा के नाम पर उसको अभी मरना नहीं आता
                    8
   बात यूँ ही  निकल गई  होगी
   रुख़ की रंगत बदल गई होगी

   नाम मेरा जो सुन लिया  होगा
   चौंक कर वो सँभल गई होगी
                    9
कौन सा है जो ग़म दिल पे गुज़रा नहीं
बारहा टूट कर भी  हूँ   बिखरा   नहीं

अब किसे है ख़बर क्या है सूद-ओ-ज़ियाँ
इश्क़ का ये नशा है जो  उतरा नहीं
       10
मसाइल और भी हैं पर तुम्हे फ़ुरसत कहाँ है
कहाँ तक हम सुनाएँ दास्ताँ  अश्क-ए-रवाँ की
                    11
वो दिन भी मैने देखें हैं  जब एक निदा इक बोली पर
सरमस्तों की टोली निकली,घर घर से दीवाने निकले

अब तक सबने लूटा मुझको ,बस झूटे वादे कर कर के
सब अपने थे वो ग़ैर नहीं सब जाने पहचाने निकले
                    12
तुम्हें भूल जाने की कोशिश में आनन
मैं ख़ुद को ही  ख़ुद भूलता  जा रहा हूँ
                    13
इलाही मेरे ! ये अदा  कौन  सी  है
कि छुपते हुए भी नज़र आ रहे हैं
                    14
मुहब्बत इक इनायत है  ख़ुदा की कारसाजी है
किसी को हुस्न जब देता ,वहीं इक दिल भी है गढ़ता

जुनून-ए-इश्क़ है तो फिर ख़िजाँ क्या है बहाराँ क्या
फ़ना होना ही जब हासिल ,शराईत कौन है पढ़ता

ये उलफ़त का जो दरिया है अजब उसकी सिफ़तआनन
जो चढ़ता है तो चढ़ता है ,नहीं चढ़ना ,नहीं चढ़ता
                    15
इबादत है   ,सदाक़त है ,न  ये  कोई तिजारत  है
वो ख़ुश क़िस्मत है जिसको मिल गई हो प्यार की मंज़िल
                    16
तू सवाल है कि जवाब है ?  ,मुझे ये बता,  मेरी  ज़िन्दगी !
मेरे दर्द-ओ-ग़म का हिसाब है कि तू बेवफ़ामेरी ज़िन्दगी !
                    17
कभी कभी तो डर लगता है ,कैसे प्यार सँभालूँगा मैं
इतना प्यार मुझे करती हो ,कैसे कर्ज़  उतारूँगा मैं
देख रहा हूँ ख़्वाब अभी से आने वाले कल का जानम
इन्शाअल्ला ! इक दिन तुम को पलकों पे बिठा लूँगा   मै        
                                  
                   18
क़ुरबत ने कुछ तो तुम से उम्मीद है जगाई
आए थे ख़्वाब रंगीं ,ना नीद आज आई
जाने किधर को लेकर जायेगा दिल दिवाना
कैसी ये तिश्नगी है , कैसी  है आशनाई

                     19
कभी कभी तो डर लगता है ,कैसे प्यार सँम्भालूँगा मैं
इतना प्यार जो तुम दे दोगी ,कैसे कर्ज़ उतारूँगा  मैं
देख रहा हूँ ख़्वाब अभी से आने वाले कल का ,जानम
इन्शा अल्ला ! इक दिन तुम को पलकों पे बिठा लूँगा मैं

                     20
1222---1222----1222-----1222
तुम्हारी बेनियाज़ी से हुआ मश्कूर है ’आनन’
कि दिल मक़्रूज़ है मेरा तुम्हारी इस इनायत से

मश्कूर = आभारी
मक़्रूज़ - ॠणी
                    
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  समाप्त






शुक्रवार, 28 जून 2019

चन्द माहिया : क़िस्त 61


चन्द माहिया : क़िस्त 61

:1:
गुलशन की हवाओं में
ज़ह्र भरा किसने
हर बार चुनावों में ?

:2:
दर्या ,परबत,झरना
चाँद सितारे सब
ये किसकी है रचना

:3:
कलियाँ सकुची सहमी
चश्म-ए-बद किसकी
आकर इन पर ठहरी

:4:
जितनी है तपिश बाहर
प्रेम अगन मन की
उतनी ही तपिश अन्दर

;5:
दिल मेरा फ़क़ीराना
छोड़ तेरा अब दर
जाना तो किधर जाना

-आनन्द.पाठक-