शुक्रवार, 14 दिसंबर 2018

ग़ज़ल 109: आज इतनी मिली है--

एक ग़ज़ल : आज इतनी मिली है--


आज इतनी मिली है  ख़ुशी आप से
दिल मिला तो मिली ज़िन्दगी आप से

तीरगी राह-ए-उल्फ़त पे तारी न हो
छन के आती रहे रोशनी  आप से

बात मेरी भी शामिल कहीं न कहीं
जो कहानी सुनी आप की आप से

राज़-ए-दिल ये कहूँ भी तो कैसे कहूँ
रफ़्ता रफ़्ता मुहब्बत  हुई  आप से

गर मैं पर्दा करूँ भी तो क्योंकर करूँ
क्या छुपा जो छुपाऊँ अभी आप से

या ख़ुदा अब बुझे यह नहीं उम्र भर
प्रेम की है अगन जो लगी आप से

ठौर कोई नज़र और आता नहीं
दूर जाए न ’आनन’ कभी आप से

-आनन्द.पाठक-

शनिवार, 24 नवंबर 2018

चन्द माहिया : क़िस्त 56

चन्द माहिया : क़िस्त 56

1
जब जब घिरते बादल
प्यासी धरती क्यों
होने लगती पागल ?

:2:
भूले से कभी आते
मेरी दुनिया में
रिश्ता तो निभा जाते

:3:
कुछ मन की उलझन है
धुँधला है जब तक
यह मन का दरपन है

:4:
जब छोड़ के जाना था
क्यों आए थे तुम?
क्या दिल बहलाना था?

:5:
लगनी होती ,लगती
आग मुहब्बत की
ताउम्र नही बुझती


-आनन्द.पाठक-


शुक्रवार, 16 नवंबर 2018

ग़ज़ल 108 : वक़्त सब एक सा नहीं होता---

एक ग़ज़ल :

वक़्त सब एक सा  नहीं होता
सुख हो दुख , देरपा नहीं होता

आदमी है,गुनाह  लाज़िम है
आदमी तो ख़ुदा  नहीं  होता

एक ही रास्ते से जाना  है
और फिर लौटना नहीं होता

किस ज़माने की बात करते हो
कौन अब बेवफ़ा नहीं  होता ?

हुक्म-ए-ज़ाहिद पे बात क्या कीजै
इश्क़ क्या है - पता नहीं  होता

लाख माना कि इक भरम है मगर
नक़्श दिल से जुदा नहीं होता

बेख़ुदी में कहाँ ख़ुदी ’आनन’
काश , उन से मिला नहीं होता

-आनन्द.पाठक- 

शुक्रवार, 2 नवंबर 2018

ग़ज़ल 107 : एक समन्दर मेरे अन्दर----

 ग़ज़ल : एक समन्दर ,मेरे अन्दर...

एक  समन्दर ,  मेरे  अन्दर
शोर-ए-तलातुम बाहर भीतर

एक तेरा ग़म  पहले   से ही
और ज़माने का ग़म उस पर

तेरे होने का ये तसव्वुर
तेरे होने से है बरतर

चाहे जितना दूर रहूँ  मैं
यादें आती रहतीं अकसर

एक अगन सुलगी  रहती है
वस्ल-ए-सनम की, दिल के अन्दर

प्यास अधूरी हर इन्सां  की 
प्यासा रहता है जीवन भर

मुझको ही अब जाना  होगा   
वो तो रहा आने  से ज़मीं पर 

सोन चिरैया  उड़ जायेगी     
रह जायेगी खाक बदन पर   

सबके अपने  अपने ग़म हैं
सब से मिलना’आनन’ हँस कर

-आनन्द पाठक-

मंगलवार, 23 अक्तूबर 2018

ग़ज़ल 106 : तुम भीड़ खरीदी देखे हो--


फ़अ’लुन--फ़अ’लुन--फ़अ’लुन--फ़अ’लुन-//-फ़अ’लुन--फ़अ’लुन--फ़अ’लुन--फ़अ’लुन
112---112--112---112 // 112--112--112--112
बह्र-ए-मुतदारिक़ मुसम्मन मख़्बून मुसक्कीन मुज़ाइफ़
------------------------------------------
तुम भीड़ ख़रीदी देखे हो ,जज्बात नहीं देखें होंगे
मुठ्ठी में बँधे इन शोलों के .असरात नहीं देखें होंगे

गरदन जो झुका के बैठे हैं , वो बेग़ैरत दरबारी है
सर बाँध कफ़न दीवानों के ,सदक़ात नहीं देखें होंगे

”भारत तेरे टुकड़े होंगे ,इन्शा अल्ला ,इन्शा अल्ला"
मासूम फ़रिश्तों सी शकलें ,जिन्नात नहीं  देखें होंगे

ये चेहरे और किसी के हैं .आवाज़ नहीं इनकी अपनी
परदे के पीछे साजिशकुन , बदज़ात  नहीं  देखें होंगे

जो बन्द मकां में रहते हैं , नफ़रत की गलियों में जीते
वो बाद-ए-सबा ,वो उलफ़त के ,बाग़ात नहीं देखें होंगे

भूखे मजलूमों की ताक़त ,शायद तुम ने जाना ही नहीं
बुनियाद हिला दें महलों के ,लम्हात नहीं देखें होंगे

गोली मैं नहीं होती ’आनन’ , कुछ प्यार में ताक़त होती है
पत्थर के शहर में फूलों के ,औक़ात नहीं देखे होंगे

-आनन्द.पाठक-
[सं 22-10-18]

शनिवार, 20 अक्तूबर 2018

चन्द माहिया : क़िस्त 55

चन्द माहिया : क़िस्त 55

:1:
शिकवा न शिकायत है
जुल्म-ओ-सितम तेरा
क्या ये भी रवायत है

:2:
कैसा ये सितम तेरा
सीख रही हो क्या ?
निकला ही न दम मेरा

  :3:
छोड़ो भी गिला शिकवा
अहल-ए-दुनिया से
जो होना था सो हुआ

:4:
इतना ही बस माना
राह-ए-मुहब्बत से
घर तक तेरे जाना

:5:
ये दर्द हमारा है
तनहाई में बस
इसका ही सहारा है

-आनन्द पाठक--

मंगलवार, 9 अक्तूबर 2018

ग़ज़ल 105 : वातनुकूलित आप ने आश्रम बना लिए---





221---2121----1221----212

वातानुकूलित आप ने आश्रम बना लिए
सत्ता के इर्द-गिर्द ही धूनी रमा  लिए

’दिल्ली’ में बस गए हैं ’तपोवन’ को छोड़कर
’साधू’ भी आजकल के मुखौटे चढ़ा लिए

सब वेद ज्ञान श्लोक ॠचा मन्त्र  बेच कर
जो धर्म बच गया था दलाली  में खा लिए

आए वो ’कठघरे’ में न चेहरे पे थी शिकन
साहिब हुज़ूर जेल ही में  घर बसा लिए

ये आप का हुनर था कि जादूगरी कोई
ईमान बेच बेच के पैसा  कमा  लिए

गूँगों की बस्तियों में वो अन्धों की भीड़ में
खोटे तमाम जो भी थे सिक्के चला लिए

’आनन’ तुम्हारा मौन कि माना बहुत मुखर
लेकिन जहाँ था बोलना क्यों चुप लगा लिए

-आनन्द.पाठक-