शनिवार, 15 जून 2019

चन्द माहिया : क़िस्त 59

चन्द माहिया : क़िस्त 59

:1:
सब क़स्में खाते हैं
कौन निभाता है
कहने की बाते हैं

:2:

क्या हुस्न निखारा है
जब से डूबा मन
उबरा न दुबारा है

:3:
इतना न सता माहिया
क्या थी ख़ता मेरी
सच,कुछ तो बता माहिया

:4:
बेदाग़ चुनरिया में
दाग़ लगा बैठे
आकर इस दुनिया में

:5:

धरती रह रह तरसी
बदली आई तो
आ कर भी नहीं बरसी

-आनन्द.पाठक-

शनिवार, 25 मई 2019

चन्द माहिया : क़िस्त 58


चन्द माहिया : क़िस्त 58

:1:
सदचाक हुआ दामन
तेरी उलफ़त में
बरबाद हुआ ’आनन’

:2:
क्यों रूठी है ,हमदम
कैसे मनाना है
कुछ तो सिखा जानम

:3:
दिल ले ही लिया तुमने
जाँ भी ले लेते
क्यों छोड़ दिया तुमने ?

:4:
गिर जाती है बिजली
रह रह कर दिल पर
लहरा के न चल पगली

:5:
क्या पाना क्या खोना
जब से गए हो तुम
दिल का खाली कोना

-आनन्द.पाठक--

चन्द माहिया : क़िस्त 57

चन्द माहिया : क़िस्त 57

1

वादा करना आसाँ
कौन निभाता है ?
ऎ ,मेरे दिल-ए-नादाँ

2
अब क्या तुम से शिकवा
छोड़ो जाने दो
जब हो ही गए रुस्वा

3
खुद को तो छुपा लोगी
ख़ुशबू जुल्फ़ों की
तुम कैसे छुपाओगी

4
ये ग़ैब अदा किसकी
दिल पे तारी है
हर साँस सदा किसकी

5
थे कितनों की ’’आसा-
-’राम” का नाम धरे
पर सोच ’करमनासा’

-आनन्द.पाठक-

शनिवार, 18 मई 2019

ग़ज़ल 121 : सपनो को रखे गिरवी

           221--  --1222           //221--      1222
       मफ़ऊलु--मफ़ाईलुन    // मफ़ऊलु---मफ़ाईलुन

ग़ज़ल   :  सपनों को रखा गिरवी--


सपनों को रखा  गिरवी, साँसों पे उधारी है
क़िस्तों में सदा हमने ,यह उम्र  गुज़ारी  है

हर सुब्ह रहे ज़िन्दा , हर शाम रहे मरते
जितनी है मिली क़िस्मत ,उतनी ही हमारी है

अबतक है कटी जैसे, बाक़ी भी कटे वैसे
सदचाक रही हस्ती ,सौ बार सँवारी  है

जब से है उन्हें देखा, मदहोश हुआ तब से
उतरा न नशा अबतक, ये कैसी ख़ुमारी  है

दावा तो नहीं करता, पर झूठ नहीं यह भी
जब प्यार न हो दिल में, हर शख़्स भिखारी है

देखा तो नहीं लेकिन, सब ज़ेर-ए-नज़र उसकी
जो सबको नचाता है, वो कौन मदारी  है ?

जैसा भी रहा मौसम, बिन्दास जिया ’आनन’
दिन और बचे कितने, उठने को सवारी है

-आनन्द.पाठक-

[सं 18-05-19]

ग़ज़ल 120 : जब भी ये प्राण निकले---

221---2122  //221--2122

एक ग़ज़ल : जब भी ये प्राण निकले---

जब भी ये प्राण निकलें ,पीड़ा मेरी  घनी हो
इक हाथ पुस्तिका  हो .इक हाथ  लेखनी हो

सूली पे रोज़ चढ़ कर ,ज़िन्दा रहा हूँ कैसे
आएँ कभी जो घर पर,यह रीति  सीखनी हो

हर दौर में रही है ,सच-झूठ की लड़ाई
तुम ’सच’ का साथ देना,जब झूठ से ठनी हो

बेचैनियाँ हों दिल में ,दुनिया के हों मसाइल
याँ मैकदे में  आना .खुद से न जब बनी  हो

नफ़रत से क्या मिला है, बस तीरगी  मिली है
दिल में हो प्यार सबसे , राहों में रोशनी हो

चाहत यही रहेगी ,घर घर में  हो दिवाली
जुल्मत न हो कहीं पर ,न अपनों से दुश्मनी हो

माना कि है फ़क़ीरी ,फिर भी बहुत है दिल में
’आनन’ से बाँट  लेना , उल्फ़त जो बाँटनी हो

-आनन्द.पाठक-

मंगलवार, 7 मई 2019

ग़ज़ल 119 : झूठ का है जो फैला--

212--      -212--       -212
फ़ाइलुन---फ़ाइलुन--फ़ाइलुन

एक ग़ज़ल : झूठ का है जो फैला धुआँ---

झूठ का है जो  फैला  धुआँ
साँस लेना भी मुश्किल यहाँ

सच की उड़ती रहीं धज्जियाँ
झूठ का दबदबा  था जहाँ

चढ़ के औरों के कंधों पे वो
आज छूने चला  आसमाँ

तू इधर की उधर की न सुन
तू अकेला ही  है  कारवाँ

जिन्दगी आजतक ले रही
हर क़दम पर कड़ा इम्तिहाँ

बेज़ुबाँ की ज़ुबाँ  है ग़ज़ल
हर सुखन है मेरी दास्ताँ

एक ’आनन’ ही तनहा नहीं
जिसके दिल में है सोज़-ए-निहाँ

-आनन्द.पाठक-

[सं 18-05-19]

शनिवार, 20 अप्रैल 2019

ग़ज़ल 118: रँगा चेहरा है उसका---

बह्र-ए-हज़ज मुसम्मन महज़ूफ़
1222---------1222-----1222-------122
मुफ़ाईलुन---मुफ़ाईलुन---मुफ़ाईलुन--फ़ऊलुन
----      -------       -----
एक ग़ज़ल : रँगा चेहरा है उसका--

रँगा चेहरा है उसका, हाथ कीचड़ में सना है
उसे क्या और करना, दूसरो पर फ़ेंकना  है

वो अपने झूठ को भी बेचता है सच बता कर
चुनावी दौर में बस झूठ का बादल  घना है

अकेला ही खड़ा है जंग के मैदान में  जो
हज़ारों तीर का हर रोज़ करता  सामना है

नज़र नापाक किसकी लग गई मेरे चमन को
बचाएँ किस तरह इसको, सभी को सोचना है

जुबाँ ऐसी नहीं थी आप की पहले कभी  तो
अदब से बोलना भी क्या चुनावों में मना है ?

उन्हे फ़ुर्सत कहाँ है जो कि सुनते हाल मेरा
उन्हें तो "चोर-चौकीदार" ही बस खेलना है

नहीं करता है कोई बात खुल कर अब तो ’आनन’
जमी है धूल  सब के आइनों पर ,पोछना है

-आनन्द पाठक-