शुक्रवार, 19 अक्तूबर 2007

चुनावी दोहे 03

राजनीति चमचागिरी यही सार यही सत्य
जितने चमचे साथ हों उतना अधिक महत्व

चमचों के दो वर्ग हैं 'घर-घूसर ' और 'भक्त'
'घर-घूसर' निर्धन करे भक्त चूस ले रक्त

'भैया' ' मालिक' मालकिन' जिसके कंधे पर
ऐसे सेवक को कहें चमचा 'घर-घूसर'

भक्त चरण में लोटता नेता जी का दास
जितनी आवें डालियाँ रख ले अपने पास

नेता से पहले मिले चमचा जी से आप
'सूटकेस' का वजन देख कारज लेते भांप

'मनसा 'वाचा' 'कर्मणा ना होगा जो भक्त
वह चमचा रह जाएगा आजीवन अभिशप्त

जिस चमचे का धर्म हो झूट कपट और छल
वह नेता बन जाएगा आज नही तो कल

(प्रकाशित प्रभात खबर रांची )

चुनावी दोहे ०२....

नेता ऐसा चाहिऐ जैसा सूप सुहाय
बोगस वोट तो गहि रहे सर वोट उड़वाय

नेता जी बुझन लगे अब अदरक के स्वाद
वोट उगाने लग गए आश्वासन की खाद

सत्ता जिसकी सहचरी कुर्सी बनी रखैल
ऐसा नेता घूमते डाल कान में तेल

नेता से टोपी भली ढंक ले सारा पाप
नौकरशाही अनुचरी आगे आगे आप

वैसे छाप अंगूठ निर्वाचन के पूर्व
जब से मंत्री बन गए भये ज्ञान के सूर्य

सुटकेश भर चल दिय्यो लिए सुदामा भेंट
द्वापर से कलियुग भयो अब दिल्ली का रेट

बलात्कार बढ़ने लगे लूट-पाट में वृद्धि -
युवा तुर्क कोई हो रहा आसपास में सिद्ध

(प्रकाशित प्रभात खबर रांची )

बुधवार, 17 अक्तूबर 2007

चुनावी दोहे 01

नेता जी बाटन लगे लड्डू चूरन नोट -
लगता है सखी आ गया बेमौसम फिर वोट

स्थायी सरकार की बात करे है लोग
मेरी गरीबी को किये जो स्थाई लोग

सामजिक इन्साफ की लोग दे रहे हांक
शहर शहर दीवार किये गावं में पांक

दल बदली करने लगे तपे तपाये लोग
अब मूल्यों की बात कहाँ,अवसरवादी योग

लोकसभा देने लगी निर्वाचन की टेर-
एक दल जुटने लगे कोआ -हंस-बटेर

गाँधी टोपी पहन कर निर्वाचन कम्पैन
शाम 'ताज' डिनर करें लिए हाथ 'शेम्पेंन

जितनी जिसने बेंच दी 'टोपी' और 'जमीर '
राजनीति में हो गयी उतनी ही जागीर

लंगडे को स्केट मिले अँधा लिए कमान
गूंगा गुंगियाता फिरे भारत देश महान

(प्रकाशित "प्रभात खबर" रांची