शुक्रवार, 19 अक्तूबर 2007

चुनावी दोहे 03

राजनीति चमचागिरी यही सार यही सत्य
जितने चमचे साथ हों उतना अधिक महत्व

चमचों के दो वर्ग हैं 'घर-घूसर ' और 'भक्त'
'घर-घूसर' निर्धन करे भक्त चूस ले रक्त

'भैया' ' मालिक' मालकिन' जिसके कंधे पर
ऐसे सेवक को कहें चमचा 'घर-घूसर'

भक्त चरण में लोटता नेता जी का दास
जितनी आवें डालियाँ रख ले अपने पास

नेता से पहले मिले चमचा जी से आप
'सूटकेस' का वजन देख कारज लेते भांप

'मनसा 'वाचा' 'कर्मणा ना होगा जो भक्त
वह चमचा रह जाएगा आजीवन अभिशप्त

जिस चमचे का धर्म हो झूट कपट और छल
वह नेता बन जाएगा आज नही तो कल

(प्रकाशित प्रभात खबर रांची )

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