गुरुवार, 31 दिसंबर 2009

स्वागत गीत : नववर्ष तुम्हारा अभिनन्दन ......

हे आशाओं के प्रथम दूत ! नव-वर्ष तुम्हारा अभिनन्दन

सौभाग्य हमारा है इतना
इस संधि-काल के साक्षी हैं
जो बीता जैसा भी बीता
पर स्वर्ण-काल आकांक्षी है

यह भारत भूमि हमारी भगवन! हो जाए कानन-नंदन
नव-वर्ष तुम्हारा............

ले आशाओं की प्रथम किरण
हम करें नए संकल्प वरण
हम प्रगति-मार्ग रखते जाएँ
विश्वास भरे नित नए चरण

भावी पीढ़ी कल्याण हेतु आओ मिल करे मनन -चिंतन
नव-वर्ष तुम्हारा ............

अस्थिर करने को आतुर हैं
कुछ बाह्य शक्तियाँ भारत को
आतंकवाद का भस्मासुर
दे रहा चुनौती ताकत को

विध्वंसी का विध्वंस करें ,हम करे सृजन का सिरजन
नव-वर्ष तुम्हारा..................

लेकर अपनी स्वर्णिम किरणें
लेकर अपना मधुमय बिहान
जन-जग मानस पर छा जाओ
हे ! मानव के आशा महान

हम स्वागत क्रम में प्रस्तुत है , ले कर अक्षत-रोली-चंदन
नव-वर्ष तुम्हारा ,....

हम श्वेत कबूतर के पोषक
हम गीत प्रेम का गाते है
हम राम-कृष्ण भगवान्
बुद्ध का चिर संदेश सुनाते हैं

'सर्वे भवन्तु सुखिन:'जय कल्याण विश्व का संवर्धन
नव-वर्ष तुम्हारा ..........

शनिवार, 19 दिसंबर 2009

ईमान कहाँ देखा .....!

ईमान कहाँ देखा.....



ईमान कहाँ देखा ,सत्यवान कहाँ देखा !

मैने देखे शहर कितने इंसान कहाँ देखा !



अबतक जो मिले मुझसे,थे दर्द भरे चेहरे

उपमेय बहुत देखे ,उपमान कहाँ देखा !



गमलों की उपज वाले माटी से कटे थे लोग

थे नाम बहुत ऊँचे,पहचान कहाँ देखा !



अंधी से गली का सफ़र जीवन का सफ़रनामा

फँसने के तरीके थे ,समाधान कहाँ देखा !



हँसने की प्रतीक्षा में क्या क्या न सहे हमने

अभिशाप बहुत ढोए वरदान कहाँ देखा !



पत्थर की तरह चेहरे ,चेहरों पे खिंची रेखा

आँखों में नीरवता ,मुस्कान कहाँ देखा !



अमृत की प्रतिष्ठा में आचरण बहुत देखे

शंकर की तरह लेकिन विषपान कहाँ देखा !



-आनन्द.पाठक

रविवार, 13 दिसंबर 2009

एक गीत : मैं प्यार माँगता हूँ .......

एक गीत : मैं प्यार माँगता हूँ......

मैं प्यार माँगता हूँ ,अधिकार माँगता हूँ !

जीवन के इस सफ़र में
श्वासों के इस भँवर में

टूटे हुए सपन का श्रृंगार माँगता हूँ
मैं प्यार माँगता हूँ........

आदर्श के सहारे
लूटी गईं बहारें

उजड़ी हुई गली का गुलजार माँगता हूँ
मैं प्यार माँगता हूँ........

दे दो कदम सहारा
क्यों कर लिया किनारा

अनजान ग़लतियों को स्वीकार मानता हूँ
मैं प्यार माँगता हूँ........

यादों को साथ लेकर
स्वप्निल बरात लेकर

मधुयामिनी मिलन का उपहार माँगता हूँ
मैं प्यार माँगता हूँ........

गुरुवार, 3 दिसंबर 2009

श्वेत-पत्र पर खून के छींटे...

[ ६ दिसम्बर,किसी भी वर्ष का एक सामान्य दिन,भारतीय राजनीति का का एक खास दिन,६-दिसम्बर -१९९२ ,बाबरी मस्जिद ढहाई गई, दो दिलों के बीच नफ़रत की दीवार उठाई गई.इस दिन को कोई शौर्य दिवस के रूप में मनायेगा,कोई पुरुषार्थ दिवस के रूप में ,कोई धिक्कार दिवस के रूप में मनाएगा,कोई इसे इन्सानियत शर्मसार दिवस के रूप में मनायेगा.लाश गिन-गिन संसद की सीढ़िया चढ़ते लोग..लिब्राहम रिपोर्ट में इल्जाम सब पर ,मुजरिम कोई नही......
जले पर नमक यह कि इस घटना पर एक श्वेत-पत्र लाने की बात हुई थी....शायद .उन्हे मालूम नहीं....इतिहास के काले पन्नों से श्वेत-पत्र नहीं लिखा जाता..
अयोध्या बाबरी मस्जिद प्रकरण पर हुए दंगे पर उत्पन्न एक सहज आक्रोश.....उस समय लिखी गई एक सहज कविता....]

एक कविता :श्वेत-पत्र पर खून की छींटे....

श्वेतपत्र पर खून की छींटे मिट न सकेंगे
चाहे जितना तथ्य जुटा लो टिक न सकेंगे

सरयू की लहरें साक्षी हैं रघुकुल रीति जहाँ की
प्राण जाए पर वचन न जाए ऐसी बात कहाँ थी
एक ईंट क्या ढही! हजारों ढही आस्था मन की
पूछ रहे हैं सिकता कण,रक्त-रंजित धार किधर की??

गिध्दों के घर शान्ति कबूतर टिक न सकेंगे
श्वेत-पत्र पर खून के .....

मन्दिर-मस्जिद नहीं बने हैं ईंटे-पत्थर-गारों से
ईश्वर कभी नहीं बँट सकता खंजर और कटारों से
मन की श्रध्दा अगर प्रबल हो,पत्थर भी शिवालय है
धर्म कभी नहीं सिंच सकता नर-रक्त की धारों से

लंगड़ी टांगे बहुत दूर तक चल न सकेंगे
श्वेत-पत्र पर खून के.....

जली बस्तियाँ ,टूटे चूल्हे ,जलती लाश तबाही देखा
निर्दोष बिलखते बच्चों को अब बोलो कौन गवाही देगा?
शब्दों के आश्वासन से तो सूनी माँग नहीं भर सकती
राखी वाले हाथ कटे हैं बोलो कौन सफ़ाई देगा ??

आरोपें और प्रत्यारोपें बिक न सकेंगे
श्वेत-पत्र पर खून के....

श्वेत-पत्र में तथ्य नहीं ,इतिहास नहीं, हिसाब चाहिए
किस-किस ने मिलकर किया हमे विश्वासघात जवाब चाहिए
हम गूँगी पीढ़ी नहीं कि असमय काल-पात्र में दफ़न हो गये
छिनी अस्मिता रोटी जिनकी ,उनको भी इंसाफ़ चाहिए

बहुत पी चुके और हलाहल पी न सकेंगे
श्वेत-पत्र पर खून के छींटे....

-आनन्द.पाठक

शुक्रवार, 27 नवंबर 2009

एक गीत: जीवन के सुबह की....

एक गीत: जीवन के सुबह की....

जीवन के सुबह की लिखी हुई पाती
मिलती है शाम ढले मुझको गुमनाम

पूछा है तुमने जो मइया का हाल
कमजोरी खाँसी से अब भी बेहाल
लगता है आँखों में है मोतियाबिन
बोलो तुम्हारी है कैसी ससुराल?

चार-धाम करने की हठ किए बैठी
खटिया पर पड़े-पड़े लेती हरिनाम

मईया से कहना कि ’मुनिया’ भली है
दूधो नहाई और ,पूतो फली है
सासू बनाने की चाहत अधूरी -
विधिना विधान की बस बातें खली है

अगले जनम की क्या बातें अभी से
मइया से कह देना हमरा परनाम

अब की जो सावन में जाना हो गाँव
बचपन की यादें औ’ कागज की नाव
मिल कर जो बाँधे थे मन्नत के धागे‘
धूप सी चुभेगी उस बरगद की छाँव

सावन के झूलों की यादें सताती -
अब भी क्या लिख-लिख मिटाती हो नाम?

सुनते हैं , लाए हो गोरी अंग्रेजन
इंगलिश में गुटुर-गूँ ,चलती है बन-ठन
बन्दर के गले पड़ी मोती की माला
ऊँट ने गले पहनी बिल्ली की लटकन
धत पगली !क्यों छेड़े मुझको फ़िर आज?
अच्छा हुआ तुमने जो लिखा नहीं नाम

छोड़ो सब बातें ,सुनाओ कुछ अपनी
कैसे हैं "वो" और बहुएँ हैं कितनी ?
नाती औ’ पोतों को दादी के किस्से
सुनाना, बताना न बातें कुछ अपनी

पोतों संग गुज़रेगी बाकी उमरिया
बहुएँ है खाने लगी फ़िर कच्चे आम

-आनन्द

बुधवार, 25 नवंबर 2009

संसद में हाथापाई : एक गीतिका

संसद में हाथापाई : एक गीतिका

रा्ज्य-सभा में लिब्राहम कमीशन मुद्दे पर जो कुछ हुआ

उसी सन्दर्भ में संसद में हाथापाई पर एक गीतिका का आनन्द उठाएं





हमें मालूम है संसद में कल फ़िर क्या हुआ होगा

कोई मुद्दा उठा होगा तो हंगामा हुआ होगा



कि जिनके थे मकां वातानुकूलित संगे मरमर के

हमारी झोपड़ी पर बहस उसने ही किया होगा



जहाँ पर धवल सुन्दर स्वच्छ संस्कॄति की अपेक्षा थी

वहीं पर पक्ष और प्रतिपक्ष कीचड़ फेंकता होगा



चले होंगे कभी रोटी पे चर्चे या बेकारी पे

मुद्दआ अन्तत: कुर्सी पर आकर ही टंगा होगा



कभी ’मण्डल’ कमण्डल पर कभी मन्दिर औ मस्जिद पर

इन्ही के नाम बरसों से तमाशा हो रहा होगा



खड़े हैं कटघरे में हम ,लगे आरोप है हम पर

कहीं पर भूल से सच बात हमने कह दिया होगा



अनास्था प्रश्न पर सरकार का गिरना जहाँ तय था

कोई क्रेता हुआ होगा ,कोई बिकता हुआ होगा



आनन्द पाठक,जयपुर

रविवार, 15 नवंबर 2009

एक गीत : सजीली साँझ का मौसम

एक गीत :सजीली साँझ का मौसम

सजीली साँझ का मौसम ,रंगीली रात का मौसम

उनीदी अधखुली पलकें
कपोलों पर झुकीं अलकें
पुरानी याद का मौसम, अधूरी बात का मौसम
सजीली साँझ का मौसम......

नयन में खिल रहे काजल
लहरता सुरमुई आँचल
तुम्हारे साथ का मौसम ,नई सौगात का मौसम
सजीली साँझ का मौसम.....

कोई मासूम बन बैठा
कोई यूँ ही गया लूटा
दिले बर्बाद का मौसम, खुले ज़ज़्बात का मौसम
सजीली साँझ का मौसम....

दबा कर होंठ के कोने
लगा दिल को मिरे छूने
बहकते राह का मौसम ,अजब हालात का मौसम
सजीली साँझ का मौसम.....

रविवार, 9 अगस्त 2009

कुछ मुक्तक

कुछ मुक्तक


हो भले तीरगी रास्ता पुरखतर
दूर आती न मंज़िल कहीं हो नज़र
हम चिरागों का क्या है जहाँ भी रखो
हम वहीं से करें रोशनी का सफ़र


ज़माने से पूछो न बातें हमारी
गमो-दर्दे-दिल की वो रातें हमारी
अगर पूछना है तो पूछो हमी से
’आनन्द’ नम क्यूँ है आँखे तुम्हारी?


लफ़्ज़ होंठो पे आ लड़खड़ाने लगे
जिसको कहने में हमको ज़माने लगे
नये ज़माने की कैसी हवा बह चली
दो मिनट में मोहब्ब्त जताने लगे

--आनन्द

शुक्रवार, 31 जुलाई 2009

एक गीत :हर बार समर्पण करता हूँ...

एक गीत :हर बार समर्पण करता हूँ...

हर बार समर्पण करता हूँ हर बार गया ठुकराया हूँ
अधखुली उनींदी पलकों पर
इक मधुर मिलन की आस रही
दो अधरों पर तिरते सपने
चिर अन्तर्मन की प्यास रही
हर बार याचना सावन की हर बार अवर्षण पाया हूँ

तेरे घर आने की चाहत
गिरता हूँ कभी फिसलता हूँ
पाथेय नहीं औ दुर्गम पथ
लम्बा है सफ़र ,पर चलता हूँ
हर बार कल्पना मधुबन की, हर बार विजन वन पाया हूँ

अभिलाषाओं की सीमाएं
क्यों खींच नहीं डाली हमने
कुछ पागलपन था और नहीं
ये हाथ रहे खाली अपने
हर बार समन्वय चाहा है, हर बार प्रभंजन पाया हूँ

क्यों मेरे प्रणय समर्पण को
जग मेरी कमजोरी समझा
क्यों मेरे पावन परिणय को
तुमने समझा उलझा उलझा
हर बार भरा हूँ आकर्षण , हर बार विकर्षण पाया हूँ
हर बार समर्पण करता हूँ..........

-आनन्द

शनिवार, 25 जुलाई 2009

एक गीत : वह बैसाखी ले एक ....

वह बैसाखी ले एक हिमालय नाप गए

मैं उजियारी राहों में भटक गया हूँ
वह अँधियारी राहों से चलते आए
मैं आदर्शों का बोझ लिए कंधों पर
वह ’वैभव’ हैं ’ईमान’ बेचते आए
मैं चन्दन,अक्षत,पुष्प लिए वेदी पर
वह चेहरा और चढा़ कर देहरी लांघ गए

वह हर दर पर शीश झुकाते चले गए
मैं हर पत्थर को पूज नहीं पाता हूँ
जिनको फूलों की खुशबू से नफ़रत थी
उनको फूलों का सौदागर पाता हूँ
मैं हवन-कुण्ड में आहुति देते फिरता हूँ
वह मुट्ठी गर्म किए ’सचिवालय’ नाप गए

उनके आदर्श शयन कक्ष की शोभा है
मैं कर्म-योग से जीवन खींच रहा हूँ
वह मदिरा के धार चढा़ आश्वस्त रहे
मैं गंगाजल से विरवा सींच रहा हूँ
मैं चन्दन का अवलेप लिए हाथों पर
वह ’रावण’ की जय बोल तिलकश्री छाप गए


-आनन्द

शनिवार, 11 जुलाई 2009

एक गीत :वह तो एक बहाना भर है ....

वह तो एक बहाना भर है, वरना मेरा जीना क्या है
वरना मेरा मरना क्या है

पोर-पोर आँसू में डूबे गीत-गीत के अक्षर-अक्षर
सजल-सजल हो उठे नयन है बह जाएंगे निर्झर-निर्झर
वह तो सिर्फ़ सुनाना भर है ,वरना मेरा रोना क्या है
वरना मेरा हँसना क्या है

प्रीति-प्रीति अँजुरी में भर-भर आंचल में भरने की चाहत
दूर-दूर कटती रहती हो ,मन हो जाता आहत-आहत
वह तो एक समर्पण भर है ,वरना तेरा पाना क्या है
वरना मेरा खोना क्या है

अब तो यादें शेष रह गई बाँहें पकड़-पकड़ कर चलना
बल खा-खा कर गिर-गिर जाना इतराती-इठलाती रहना
दर्दो को दुलराता भर हूँ वरना मेरा सोना क्या है
वरना मेरा जगना क्या है

मेरी लौ से रही अपरिचित पावन-सी यह प्रीति तुम्हारी
पत्थर-पत्थर से है परिचित शीशे की दीवार हमारी
तेरी देहरी छूना भर है वरना मेरा गिरना क्या है
वरना मेरा उठना क्या है

वह तो एक बहाना भर है ......

-आनन्द

गुरुवार, 2 जुलाई 2009

एक ग़ज़ल : ज़माने की अगर हम....

ज़माने की अगर हम बेरुखी से डर गए होते

न होती आग दिल में तो कभी के मर गए हो्ते



अगर हम ज़ब्त ना करते सदा-ए-दिल गमे-उल्फ़त

जो टकराते पहाड़ों से पिघल पत्थर गए होते



हमारा ज़िक्र भूले से कोई जो कर गया होता

यकीनन उनकी आँखों में भी आँसू भर गए होते



अगर बुतख़ाने से पहले तिरी महफ़िल नहीं मिलती

सुकूँ दिल को कहाँ मिलता कि किसके दर गए होते



सभी के वास्ते ’आनन्द’ ज़ुदा राहें यहाँ सबकी

किसी भी रास्ते जाते तुम्हारे घर गए होते



--आनन्द

शुक्रवार, 26 जून 2009

एक गीत : देवता बनना कहीं आसान है....

देवता बनना कहीं आसान है ,बोझ फूलों का उठाना ही कठिन |

डूबने को हर किनारे मिल गए
पार लगाने का नहीं कोई किनारा
कल जो अपने थे पराए हो गए
गर्दिशों में जब रहा मेरा सितारा
दीप बन जलना कहीं आसान है,उम्र भर पीना अँधेरा ही कठिन

जिंदगी अनुबंध में जीते रहे
फूल बस सीमा नहीं है गंध की
जो मिला हैं प्यार पीडा में मिला हैं
जिन्दगी बस नाम है सौगंध की
बन्धनों में बंध गए आसान है,तोड़ना बंधन यहाँ पर है कठिन

अश्रु के दो कण कि सागर हो गये
भाव मन का ही हिमालय बन गया
जब चढाये साधना के अर्ध्य पावन
राह का पत्थर शिवालय बन गया
नीलकंठ बनना कहीं आसान है,पी हलाहल मुस्कराना ही कठिन
देवता बनना कहीं आसान है .....

---आनंद

शुक्रवार, 19 जून 2009

हास्यिका :अथ श्री चमचा पुराण : कुछ दोहे

राजनीति चमचागिरी यही सार यही तत्व
जितने चमचे साथ हों उतना अधिक महत्त्व

मनसा वाचा कर्मणा ना होगा जो भक्त
वह चमचा रह जाएगा आजीवन अभिशप्त

नेता से पहले मिले चमचा जी से आप
'सूटकेस' का वज़न देख कारज लेते भांप

चमचों के दो वर्ग हैं 'घर-घूसर' और 'भक्त '
घर-घूसर निर्धन करे , भक्त चूस ले रक्त

'घर-घूसर' घर में घुसे पीकदान ले आय
तेल लगा मालिस करे नेता जी का काय

भक्त चरण में लोटता नेता जी का दास
जितनी आवे 'डालियाँ' रख ले अपने पास

'भैया''मालिक'मालकिन' जिसके कन्धों पर
ऐसे सेवक को कहे चमचा 'घर-घूसर'

|| अथ श्री चमचा पुराण प्रथमोध्याय ||

मंगलवार, 16 जून 2009

एक प्रणय गीत : तुम हमारी जीत भी हो .....

तुम हमारी जीत भी हो हार भी |
नीड़ का निर्माण करने को विकल
दो विहग जाने कहाँ से आ मिले हैं
विश्व में नव-गंध भर देंगे कभी -
दो सुमन अब इस धरा पर खिल उठे है
कल तुम्हारा रेशमी आँचल कहेगा
मैं तुम्हारा रूप भी , श्रृंगार भी |

खींच कर दो कोर काजल की नयन में
केश कुंतल राशि में गजरा सजा कर
सोलहो श्रृंगार कर के क्यों खड़ी हो ?
देखती हो राह क्यों सपने सजा कर ?
जब कभी दर्पण तुम्ही से कह उठेगा
उर्वशी देखी है पहली बार ही |

बोझ यह पत्थर उठाएगा कहाँ तक
भावना के फूल जो इतने चढाये
कौन-सी आराधना तुम कर रही ?
सच बता दो कौन-सी पूजन विधाये ?
जानती हो कल यह पत्थर क्या कहेगा ?
तुम मेरी आराधिका आराध्य भी |

वह तुम्हारी अर्चना थी या मेरी ?
कौन किसको मांग कर जग पा गया है
कौन-सी मनुहार थी यह तो बता दो
साथ चलने को कोई अब आ गया है
मिल गई हो अब न बिछुडेगे कभी
तुम प्रिये ! इस पार भी ,उस पार भी

क्या तुम्हे मालूम की दो नयन में
कितने अकिंचन स्वप्न जो मैंने उतारे
क्या मुझे मालूम तुम दीपक तले !
और मैंने शून्य में कितने पुकारे
जब कभी भुजपाश का बंधन कसेगा
तुम कहोगी दर्द भी है प्यार भी

क्यों हमारे गीत हर दम खोजते है
दो अधर के गुनगुनाने का सहारा ?
क्यों नहीं सजते हमारे सुर बता दो
रागिनी क्यों चाहती तेरा इशारा ?

जब तुम्हारे होंठ मेरी बांसुरी पर हो
तब प्रिये!तुम गीत भी हो राग भी |
तुम हमारी जीत हो ......

-आनंद

गुरुवार, 11 जून 2009

एक गीत : तुम बिना पढ़े ....

.....
तुम बिना पढ़े लौटा दी मेरी आत्मकथा
'आवरण' देख पुस्तक पढ़ने की आदी हो

तुम फूलों का रंगों से मोल लगाती हो
मैं भीनी-भीनी खुशबू का आभारी हूँ
तुम सजी-सजाई दुकानों की ग्राहक हो
मैं प्यार बेचता गली-गली व्यापारी हूँ
तुम सुन न सकोगी मेरी अग्नि-शिखा गीतें
तुम रिमझिम सावन मेघ-मल्हार की आदी हो

मैं भर न सका जीवन में सतरंगी किरणे
मैं पा न सका हूँ तेरे आँचल की छाया
मैं गूँथ न सका बन तेरी वेणी का गजरा
जीवन के तपते रेतों पर चलता आया
क्यों पथरीली राहों से बच-बच चलती हो
तुम बेला- चंपा- जुही कली की साथी हो

तुम चाँद सितारों की बातें करती हो
पर धरती के संग जुड़ने से डरती हो
तुम नंदन-कानन उपवन खेल रही हो
क्यों चन्दन वन की सुधियों में रहती हो
तुम थके पाँव में छाले पड़ना क्या जानो
तुम पाँव महावर मेहदी रचने की आदी हो

तुम मेरे उच्छवासों के लय में घुली रही
क्यों मेरे प्रणय-समर्पण से अनजान रही
जो देखा तुम ने मेरा श्यामल रंग देखा
क्यों मेरे मानस-मंदिर की पहचान नहीं
तुम मुझे परख ना पाई हो अफ़सोस यही
तुम विज्ञापन से दोस्त बनाने की आदी हो

-आनंद

सोमवार, 8 जून 2009

एक गज़ल : जब से तुम से मिली....

जब से तुम से मिली जिन्दगी
सांस लेने लगी जिन्दगी

रूह अपनी निखरने लगी
आईने-सी लगी जिन्दगी

कितने सपने लगी देखने
चार दिन की बची जिन्दगी

उनके दीदार की जुस्तजू
मेरी दीवानगी जिन्दगी

अब न जाएं यहाँ से कहीं
छोड़ तेरी गली ज़िन्दगी

यह तो है इश्क की इब्तिदा
बेखुदी हो गई ज़िन्दगी

जब न ’आनन्द’ ही हमसफ़र
बेसबब सी लगी जिन्दगी

-आनन्द

शुक्रवार, 5 जून 2009

हास्य क्षणिका...

हास्यिका : हो जाए कुछ हल्का- फुल्का मिर्च-मसला
बैठे- ठाले 'आनंद' जी ने क्या लिख डाला
सावुनी दोहे
'चारित्रिक व्यक्तित्व पर जो कीचड लग जाय
'सर्फ़-अल्ट्रा' से धोइए श्वेत-धवल हो जाय

साबुन मल-मल जग मुआ धवल वस्त्र न होय
एक हाथ 'ओ0के०' मल्यौ धवल-धवल ही होय

लडकी देखन जाईहौ वस्त्र लिहौ चमकाय
'हरा डिटर्जेंट व्हील ' का इज्ज़त लिऔ बचाय

'सुपर-सर्फ़ से धुल गयौ भ्रष्टाचार लकीर
दाग ढूढते रह गए साधू - संत - फकीर

नशा चढ़ गया फिल्म का टूटा उनका मौन
हर कन्या से पूछते हम आप के कौन

-आनंद

शनिवार, 30 मई 2009

एक गीत : मालूम था मेरी देहरी ....

मालूम था मेरी देहरी को ठुकरा कर चल जाना है
फिर भी तेरे स्वागत में है वन्दनवार सजाए ||

ऋचा-मन्त्र से आह्वान पर आह्वान करता हूँ
हवन-कुण्ड में आकांक्षा की समिधा देता हूँ
वही प्रतीक्षारत हैं आँखे कल भी आज वही
मुझको क्या मालूम नहीं था शर्ते आने की !

मालूम था पत्थर न कभी पिघला है न पिघलेगा
फिर भी आशाओं की अंजुरी भर-भर फूल चढ़ाए

एकाकी रातों की बातें तारो संग बांटे हैं
आँखों में सपने भर-भर अंधियारी कांटे है
उनको ही दुलराता हूँ सम्बल एकाकीपन की
वरना क्या मालूम नहीं था शर्तें चाहत की !

मालूम था मेरे आँगन में खुशियाँ कभी न उतरी हैं
फिर भी आंसू भर-भर कर हैं स्वागत कलश सजाए

सब ने हमको भ्रमित किया लम्बी राह दिखा कर
'ढाई-आखर' भुला दिया है ऊँची बात सुना कर
'पाप-पुण्य' है'ऊंच-नीच' है कैसी धर्म विवशता !
भुला दिया है आज मनुज ने मानव से मानवता

मार्ग अपावन उदघोषित कर तुम न इधर आओगे
फिर भी तेरे स्वागत में है पलकें पाँव बिछाए

संबोधन की मर्यादा है , संबोधन चाहे जो हो
सत्य-समर्पण ही शाश्वत ,नाम भले जो कह लो
मेरे मंदिर-आसन भी परित्यक्त नहीं,अभिमंत्रित है
प्राण-प्रतिष्ठा पावन क्षण में आप स्वयं आमंत्रित हैं

मालूम है सूनी नगरी में भला कौन आया है
फिर भी चन्दन-रोली-अक्षत अर्चन थाल सजाए
मालूम था .....

-आनंद

शनिवार, 23 मई 2009

एक गीत : जिसको दुनिया के मेले में ....

जिसको दुनिया के मेले में ढूढा किया
घर के आँगन के कोने मिली जिन्दगी

उम्र यूँ ही कटी भागते - दौड़ते
जिन्दगी खो गई जाने किस मोडे पे
'स्वर्ण-मृगया' के पीछे कहाँ आ गए !
रिश्ते-नाते ,घर-बार सब छोड़ के

प्यास फिर भी मेरी अनबुझी रह गई
आकर पनघट पर ,प्यासी रही जिन्दगी

आकर पहलू में तेरे सिमटने लगे
मायने जिन्दगी के बदलने लगे
चंद रिश्तों पे चादर ढँकी बर्फ की
प्यार के गरमियों से पिघलने लगे

सर्द मौसम में तुमने छुआ इस तरह
गुनगुनी धूप लगने लगी जिन्दगी

आते-आते यहाँ दिल धड़कने लगा
आँख फड़कने लगी,होंठ फड़कने लगा
पास उनकी गली तो नहीं आ गई ?
बेसबब यह कदम क्यों बहकने लगा !

जब खुदी में रहे उनसे न मिल सके
बेखुदी में रहे तो मिली जिन्दगी

यूँ 'आनंद ' ज़माने में बदनाम है
जो देता मुहब्बत का पैगाम है
हुस्न के सामने क्या सर झुक गया
बुत-परस्ती का सर पर इलजाम है

जब से दुनिया ने मुझको काफिर कहा
तब से करने लगा हुस्न की बंदगी

जिसको दुनिया के मेले में ..........

आनंद

शुक्रवार, 22 मई 2009

एक कविता : कितने पौरुष वीर .....

कितने पौरुष वीर पुरुष है !
हाथों में बंदूक लिए
नारी को निर्वसना कर के
हांक रहे है सीना ताने
मरा नहीं दुर्योधन अब भी
जिंदा है हर गाँव शहर में
अगर मरा है
'धर्मराज'का सत्य मरा है
'अर्जुन ' का पुन्सत्व मरा है
'भीम' का भीमत्व मरा है
दु:शासन तो अब भी जिंदा
अट्टहास कर हंसता-फिरता
हाथों में बंदूक लिए
पांचाली का चीर चीरता
क्या अंतर है ????
कुरुक्षेत्र हो ,बांदा हो , चौपारण हो
हमें प्रतीक्षा नहीं कि
कोई कृष्ण पुन: गीता का उपदेश सुनाए
अपना अपना कुरुक्षेत्र है
संघर्ष हमें ही करना होगा
हमे स्वयं ही लड़ना होगा
इसी व्यवस्था में रह कर
इन्द्र-प्रस्थ फिर गढ़ना होगा

-आनंद

बुधवार, 20 मई 2009

हम बंजारे नगरी नगरी अपना कहाँ ठिकाना है
सुबह जलाए चूल्हा-चाकी शाम हुए उठ जाना है

दो दिन बाद पकी हैं रोटी ,धुँआ लग गई कोठी में
महलों वाले सोच रहे हैं ,झुग्गी वाले हेन्ठी में
सुबह-शाम की भाग-दौड़ में जो कुछ हासिल हो पाया
लाद चले हैं खटिया-मचिया छोड़ यहीं सब जाना हैं
हम बंजारे नगरी नगरी ....


आती है आवाज़ कहीं से दूर क्षितिज के पार गगन
धीरे-धीरे बढ़ता जाता अवचेतन मन मगन मगन
एक तमाशा मेरे अन्दर सभी तमाशों में शामिल
हो जाएगा खतम तमाशा एक दिशा सब जाना है
हम बंजारे नगरी नगरी ....


जितना मिला उसी में जीना उतना मेरा राज महल
माटी का घट रोना क्या! मन क्यूँ रहता विकल-विकल
नीचे धरती के सैया है ऊपर नीली छतरी है -
चंवर डुलाते पेड़ खड़े हैं अपना यही खजाना है
हम बंजारे नगरी नगरी ...


सबके अपने- अपने कुनबे,अपनी राम कहानी है
सबकी अपनी -अपनी डफली सबकी राग पुरानी है
ढाई-आखर' ही पढ़ने में बीत गई जब सारी उमरिया
जैसी ओढी रही चुनरिया वैसी ही धर जाना है
हम बंजारे नगरी नगरी ...

-आनंद

मंगलवार, 19 मई 2009

एक गीत :नफ़रत नफ़रत से बढ़े...

नफ़रत नफ़रत से बढ़े प्यार से प्यार बढ़े
अपनी बांहों में ज़माने को समेटो तो सही

लोग सहमे हैं खड़े खिड़कियाँ बंद किए
आँखे दहशत से भरी होंठ ताले हैं पड़े
उनके दर पे भी कभी प्यार से दस्तक देना
जिनकी खुशियाँ हैं बिकी सपने गिरवी हैं रखे
कौन कहता है कि पत्थर तो पिघलते ही नहीं
अपनी आँखों में बसा कर ज़रा देखो तो सही

कितनी बातें हैं रूकी पलकों पे कही अनकही
कितनी पीडा है मुखर अधरों पे सही अन सही
साथ अपने भी सफ़र में उन्हें लेते चलना -
राह में गिर जो पड़े श्वासें जिनकी हो थकी
तेरे कदमो पे इतिहास को झुकना होगा
हौसले से दो कदम ज़रा रखो तो सही

जो अंधेरों में पले जिनकी आवाजें दबी
भोर की क्या हैं किरण! जिसने देखी ही नहीं
जिनके सपने न कोई आँखे पथराई हों -
मुझको पावोगे वहीं उनकी बस्तियों में कहीं
कौन कहता हैं अंधेरों की चुनौती है बड़ी
एक दीपक तो जला कर कहीं रखो तो सही

-आनंद

एक कविता " मृदुल अंकुर भी ...

मृदुल अंकुर भी
तोड़ कर पत्थर पनपती है
एक उर्जा-शक्ति
अंतस में धधकती है
'मगर हम आदमी है
उम्र भर लड़ते रहे नित्य-प्रति की शून्य अभावों से
रोज़ सूली पर चढ़े - उतरे
आँख में आंसू भरे
और तुम? देवता बन कर बसे
जा पहाडों में ,गुफाओं में कन्दराओं में !
या नदी के छोर
दूर सागर से,कहीं उस पार
या किसी अनजान से थे द्वीप
या पर्वतों की कठिन दुर्गम चोटियां
वह पलायन था तुम्हारा??
या संघर्षरत की चूकती क्षमता ??
या स्वयं को निरीह पाना ??
या की हम से दूर रहना ??
हम मनुज थे
आदमी का था अदम्य साहस
खोज लेंगे ,आप के आवासस्थल
कंदरा में या गुफा में
यह हमारी जीजिविषा है
कट कर पत्थर पहाडों के
बाँध कर उत्ताल लहरें , सेतु-बन्धन
गर्जनाएं हो समंदर की
या कि दुर्गम चोटियां
हो हिमालय की , शिवालिक की
आ गएँ हैं पास भगवन !
यह हमारी शक्ति है
भाग कर हम जा नहीं बसते
कन्दराओं मे, गुफाओं में
क्यों की हम आदमी है
शून्य अभावों में
संघर्ष रत रहना हमारी नियति है

-आनन्द-

सोमवार, 18 मई 2009

एक कविता : तुम जला कर....

तुम जलाकर दीप
रख दो आँधियों में \
जूझ लेंगे जिन्दगी से
पीते रहेंगे
गम अँधेरा ,धूप ,वर्षा
सब सहेंगे \
बच गए तो रोशनी होगी प्रखर
मिट गए तो गम न होगा \
धूम-रेखा लिख रही होगी कहानी
"जिन्दगी मेरी किसी की भीख न थी

---आनंद

कुछ मुक्तक

कुछ मुक्तक

पारदर्शी तेरा आवरण
कर न पाया तुझे संवरण
मैंने दर्शन बहुत कुछ पढ़ा
पढ़ न पाया तेरा व्याकरण
-- ० --

भावना का स्वरुपण हुआ
अर्चना का निमंत्रण हुआ
फूल क्या मैं धरूँ देवता !
----०-----

आज अपना हूँ मैं संस्मरण
तुम भले ही कहो विस्मरण
आज स्वीकार कर लो मेरी
जिंदगी का नया संस्करण

रविवार, 17 मई 2009

एक ग़ज़ल : मोहन के बांसुरी की जैसे तान....

मोहन के बांसुरी की जैसे तान है ग़ज़ल
कोयल की कूक मीठी जैसी गान है ग़ज़ल

जैसे कि मां की गोद में सोया हुआ बच्चा
चेहरे पर हौले-हौले मुस्कान है ग़ज़ल

खिलते हुए कमल पे ठहरी हुई शबनम
छूने को मचलती हुई अरमान है ग़ज़ल

मिलते कभी सफर में जैसे दो अजनबी
परदेश में ज्यों अपनी पहचान है ग़ज़ल

फूलों की घाटियों में बहती हुई दरिया
बादे - सहर की जैसे उनवान है ग़ज़ल

जीवन के साधना में ऋचा मन्त्र-सी लगे
जैसे ऋषि-मुनि कोई ध्यान है ग़ज़ल

वह पूछती हैं हमसे ग़ज़ल कौन सी बला
तेरा रूप है ग़ज़ल मेरा ईमान हैं ग़ज़ल

एक गीत : फ़िर कहीं दूर आँगन में ....

फ़िर कहीं दूर आँगन में धुँआ उठा ,कहीं 'सीता' जली 'सावित्री' जली
दो ह्रदय के अधूरे मिलन जल गए
दो नयन के सजीले सपन जल गए
प्यार पूजा से क्यों वासना हो गई
फूल जूडा के जूडे में ही जल गए
आदमी ने जलाया उसे आज तक ,कहीं 'गीता' जली गायत्री जली

मांग सिन्दूर का रंग पीला हुआ
आदमी इस तरह क्यूँ हठीला हुआ
फूल आँचल में भर न सका प्यार के
जो दिया भी तो जीवन कंटीला हुआ
आदमी की सडन्ध सोच की क्या कहें ! एक 'कुंती' जली 'दमयंती' जली

क्या हुए वो शपथ सात फेरे हुए ?
यह सुबह ही सुबह क्यों अंधेरे हुए
हाथ अग्नि-शलाका लिए आदमी
घर के आँगन की 'तुलसी'को घेरे हुए
थाल अर्चन की थी क्यूँ जहर हो गई ,कहीं 'रोली' जली एक 'कुमकुम' जली

अंखियों में सजा नेह कजरा जला
वेणियों में गुंथा प्यार गजरा जला
थी किसी के कलाई की राखी जली
एक ममता जली स्नेह अंचरा जला
पाँव महावर थे पेट्रोल में धुल गए, कहीं 'गंगा जली 'गंगोत्री' जली

एक नारी जली प्रीति बिंदिया जली
एक सुहागिन की पावन बिछिया जली
'उर्मिला' की प्रतीक्षा घडी जल गई
एक बाबुल की प्यारी बिटिया जली
चंद पैसों का भूखा हुआ आदमी ,कहीं 'राधा'जली 'राधिका ' जली

ना ही उषा जली ना मनीषा जली
जो जले आदमी के ही चहरे जले
बात करते हैं इंसानियत की वही
अंत: दिल के जले बाहर लगते भले
एक दुल्हन के नैहर की चुनरी जली एक सभ्यता जली एक संस्कृति जली
फ़िर कहीं दूर आँगन में ........

एक ग़ज़ल :पंडित ने कहा इधर ...

पंडित ने कहा इधर से है मुल्ला ने कहा इधर से है
हम बीच खड़े हैं दोनों के तेरे घर की राह किधर से है

नफ़रत का धुँआ उठा करता अपनो का ही दम घुटता है
इस बंद मकाँ के कमरे में कहो रोशनदान किधर से है

सब भटके भूल-भूलैया में जंत्री में पोथी पतरा में
जो प्रेम की राह निकलती है उस दिल का का राह किधर से है

मथुरा से हैं ?काशी से हैं ? उज्जैनी हैं ? अनिवासी हैं ?
हर तीर्थ पे पण्डे पूछ रहे 'बोलो जजमान किधर से हैं ?

जो दान-पुण्य करना कर दो पुरखे तो इसी पोथी में
बच कर भी जाओगे कहाँ हम जागीरदार इधर के हैं

जो चांदी के मन्दिर में हैं सोने के सिंहासन पर
जो शबरी की कुटिया में हैं वह भगवान किधर के हैं?

चुनावी दोहे ...

मन में चाहे कुटिलता दिल में चाहे घात
हाथ जोड़ मिलते रहें जनता से दिन-रात

रस्सी तनी चुनाव की नेता जी चढ़ जाय
देख संतुलन पाँव के नट-नटिनी शरमाय

पक्ष-विपक्ष करने लगे अब हमाम की बात
बाहर चाहे जो दिखे भीतर सब को ज्ञात

बरसों खिड़की बंद है नई हवा नहीं आय
वही रूढिवादी विचार धुँआ -धुँआ भर जाय

ढकी रहे उतनी भली इस चुनाव अभियान
बीच सड़क मत धोइए चड्डी व् बनियान

जनता ही समझी नहीं मेरे कार्य महान
वरना हम नहीं हारते इस चुनाव दौरान


एक ग़ज़ल : रह कर भी समन्दर में ....

रह कर भी समन्दर में प्यासी ये मछलियाँ
किस बात पे रहती है उदासी ये मछलियाँ

'राधा' की प्यास हो या 'मीरा' की प्यास हो
हर प्यास एक रंग की प्यासी ये मछलियाँ

पानी के आईने में नया रूप देखतीं
दो पल को खुशगवार रूवासी ये मछलियाँ

हर बार फेंकते है नए जाल मछेरे -
फंसने के लिए आतुर प्यासी ये मछलियाँ

अब रास्ता दिखाती नहीं 'आदि-मनु ' को
हो गई हैं जब से सियासी ये मछलियाँ

गहराइयों में डूब कर भी डूबती नहीं
किस लोक की होती निवासी ये मछलियाँ

वह ढूढती हैं किस को ,किस का पता लिए
किस छोर को जाती हैं प्रवासी ये मछलियाँ

एक कविता : प्यासी धरती प्यासे लोग ....

प्यासी धरती प्यासे लोग !
इस छोर तक आते-आते
सूख गई हैं कितनी नदियाँ
दूर-दूर तक रह जाती है
बंजर धरती ,रेत रेतीले टीले
उगती है बस झाड़-झाडियाँ पेड़ बबूलें
काँटों वाले ,हाथों में बन्दूक लिए ए०के० सैतालिस
साए में भी धूप लगे है
- - -
'बुधना' की आँखे
नीरव प्यास भरी है
सूना कहीं है
'दिल्ली' से नदियाँ चलती है
आयेगी उसके भी गाँव
ताल-तलैया भर जायेंगे
हरियाली फ़िर हो जायेगी
हो जायेगी धरती सधवा
---- --
लेकिन कितना भोला 'बुधना'
नदियाँ इधर नहीं आती हैं
उधर खड़े हैं बीच-बिचौलिए
'अगस्त्य-पान' करने वाले
मुद जाती है बीच कहीं से
कुछ लोगों के घर-आँगन में
शयन कक्ष में
वर्ष -वर्ष तक जल-प्लावन है
कहते हैं वह भी प्यासे
प्यासे वह भी,प्यासे हम भी
दोनों की क्या प्यास एक है?
"परिभाषा में शब्द-भेद है "

शनिवार, 16 मई 2009

एक समर्पण गीत ....

एक समर्पण गीत ....

चेतना हो जहाँ शून्य उस मोड़ पर
वेदना हो जहाँ मूक उस छोर पर
हँस उठे प्राण-मन खिल उठे रोम तन
गूँज भर दो मेरी बांसुरी में ....

भावना के सिमटने लगे दायरे
टूटने जब लगे प्रीत के आसरे
मैं पुकारूं तुझे श्वांस बन कर मिलो
जिन्दगी की सफ़र आख़िरी में ....

अर्चना के सभी मूल्य मिटने लगे
साधनायें बिना अर्थ लगाने लगे
फूल पूजा के बन कर बिखरने लगो
अर्ध निर्मित मेरे मंदिरों में ....

गंध ही जब नहीं फूल किस काम का !
जब न तुम ही जूडो नाम किस नाम का
गीत मेरे कभी लड़खडाने लगे
सुर मिलाना कि रस-माधुरी में ....

रूप क्या है , सजा कल सजे ना सजे
मांग क्या है , भरा कल भरे न भरे
शुभ मुहूरत मिलन की घड़ी देख कर
दान कर दो मेरी अंजुरी में .....

प्यार ही में रंगा तन रंगा मन रंगा
इन्द्रधनु भी रंगा सप्त रंग में रंगा
रंग ऐसा भरो जो कि मिट ना सके
अर्ध विकसित प्रणय-पंखुरी में ....

---आनंद

शुक्रवार, 15 मई 2009

हाइकू ...

हाइकू
सांझ सकारे
याद तुम्हारी आई
तुम्हे पुकारे
-- --
बच्चों की टोली
छू माँ का आँचल
करे ठिठोली
+ +
गरीबी रेखा
बढ़ती हुई दिखी
जिधर देखा
* *
नन्ही चिडियां
खेल रही आँगन
जैसे गुडिया
-आनंद

गुरुवार, 14 मई 2009

एक गीत : कुंकुम से नित माँग सजाए ...


कुंकुम से नित माँग सजाए ,प्रात: आती कौन ?
प्राची की घूँघट अध खोले
अधरों के दो पुट ज्यों डोले
मलय गंध में डूबी-डूबी तुम सकुचाती कौन ?

फूलों के नव-गंध बटोरे
अभिरंजित रश्मियाँ बिखेरे
करती कलरव गान विहंगम तुम शरमाती कौन?

प्रात समीरण गाती आती
आशाओं की किरण जगाती
छम-छम करती उतर रही हो नयन झुकाती कौन?

लहरों के दर्पण भी हारे
जब-जब तुमने रूप निहारे
पूछ रहे हैं विकल किनारे तुम इठलाती कौन?
कुंकुम से नित माँग सजाए ....

एक गीत : मत छूना प्रिय मुझको....

मत छूना प्रिय! मुझको अपने स्नेहिल हाथों से --
पोर-पोर तक दर्द भरा है तन-मन प्राण छलक जाउंगी

इस नगरी से जाना ही था क्यों आये थे प्रेम नगरिया ?
जस का तस जब धरना ही था क्यूँ ओढी थी प्रेम चुनरिया?
जाल सुनहले नहीं फेंकना तन का रंग ही नहीं देखना
अंग-अंग में प्यास भरी है कभी जाल में फंस जाउंगी

पोर-पोर तक दर्द भरा है........

चली काल की मथनी जब भी सब में गोरस-माखन छलका
जाने मेरी गागर कैसी केवल पानी-पानी छलका
अधरों पर उषा की किरणे आँखों में है स्वप्न सजीले
रेती पर बालू का घर हूँ ना जाने कब ढह जाउंगी

पोर-पोर तक दर्द भरा है .....

तन का पिजरा रह जाएगा उड़ जायेगी सोन चिरैया
खाली पिंजरा दो कौडी का क्या सोना क्या चांदी भैया
इतनी ठेस लगी है मन में इतने खोंच लगे जीवन में
सिलने की कोशिश मत करना तार-तार में हो जाउंगी
पोर-पोर तक दर्द भरा है ....

श्वास श्वांस पर क़र्ज़ खडा है समय दे रहा जिस पर पहरा
कंधे-कंधे चला करेंगे जिस दिन होगा पूर्ण ककहरा
किसके लिए भाग-दौड़ थी कब मुठ्ठी में धूप समाई
खाली हाथ चली आई थी खाली हाथ चली जाउंगी

पोर-पोर तक दर्द भरा है...

एक गीत : मैं अँधेरा अभी पी रहा हूँ...

मैं अँधेरा अभी पी रहा हूँ भोर की इक किरण के लिए

वैसे मुझको भी मालूम था राज दरबार की सीढियां
वह कहाँ से कहाँ चढ़ गए ,तर गई उनकी दस पीढियां
मैं वहीँ का वहीँ रह गया उनकी नज़रों में ना आ सका
लेकिन सर को झुकाया नहीं एक मन की खुशी के लिए
मैं अँधेरा अभी पी रहा हूँ....

मोल सबकी लगाते चले हैं खोटे सिक्कों से वह तौल कर
एक मैं हूँ कि जी-मर रहा हूँ ,अपने आदर्शों पर ,कौल पर
जिंदगी की समर में खडा हूँ ,हार की जीत का प्रश्न नहीं
पावँ पीछे हटाया नहीं सत्य की आचरण के लिए
मैं अँधेरा अभी पी रहा हूँ....

आरती हैं उतारीं गई ,गुप्त समझौते जो कर लिए
रोशनी के लिए जो लड़े ,रात में खुदकुशी कर लिए
ना वह पन्ने हैं इतिहास के ना शहीदों की मीनार में
उसने जितना जिया आज तक एक मन की खुशी के लिए
मैं अँधेरा अभी पी रहा हूँ....

आप क्या हैं खरीदे मकाँ पे नाम का इक शिला-पट जड़े हैं
उनके सर पे ना छत हो सकी है सत्य -आदर्श से जो जुड़े हैं
जिंदगी ना मेरी भीख हैं ना किसी की यह सौगात हैं -
मैंने जितना जिया आजतक एक मन की खुशी के लिए
मैं अँधेरा अभी पी रहा हूँ....

एक गीत : किसी का प्रणय तन-मन हूँ ....

किसी का प्रणय तन-मन हूँ ,किसी की कल्पना भी हूँ

मैं किसी की एक वीणा- तार कम्पन
या किसी मनु का अनागत गहन चिंतन
किसी का अंक-शायी हूँ , किसी की कामना भी हूँ .
किसी का प्रणय तन-मन हूँ....

रात भर बंदी बनाए रही कलिका
देखती है सुबह उड़ना निठुर अलि का
कहीं अभिशप्त हूँ परित्यक्त ,कहीं आराधना भी हूँ .
किसी का प्रणय तन-मन हूँ....

कहीं सिन्दूर हूँ मैं चिर सुहागन का
किसी की एक पावन ज्योति आँगन का
किसी को मैं अपावन हूँ ,किसी की साधना भी हूँ
किसी का प्रणय तन-मन हूँ...

कल्प से जलता रहा दीपक सरीखा
पी रहा हूँ घन अँधेरा मैं किसी का
किसी को एक पत्थर भर ,किसी की अर्चना भी हूँ
किसी का प्रणय तन-मन हूँ...

मैं किसी को एक अनबूझी पहेली
औ प्रतीक्षा मैं कोई बैठी अकेली
किसी को मैं अयाचित हूँ ,किसी की याचना भी हूँ
किसी का प्रणय तन-मन हूँ...

एक ग़ज़ल : चांदी की तश्तरी ना...

चांदी की तश्तरी ना ,सौगात ना महल के
कुछ प्यार के हैं नग्मे, कुछ दर्द हैं ग़ज़ल के

तेरे घर के रास्ते में फिसलन भी कम नहीं है
फिर भी मैं आ रह हूँ बच-बच सँभल-सँभल के

तेरे दर पे कैसे आते ? मेरी ओढ़नी फटी थी
दिल को ना था गवारा आते की भेष बदल के

कभी जिन्दगी मुक्कमल नहीं हो सकी मुखातिब
कभी किस्स-ए-फना थे कभी बात थे अज़ल के

दिल को मिला सकूं तो तेरा घर समझ लिया
कोशिश तो ज़माने की बर्बाद-ओ-खलल के

मुझ पर कभी तो होगी उनकी नज़र इनायत
चरचे बहुत सुने हैं रहम-ओ-करम फज़ल के

आँखों खुली जो देखा 'आनंद' वह था सपना
देखेंगे अब हकीकी बंद आँखे कर असल के

-आनंद-

गीत ; मैं स्वयं में खोया-खोया...


मैं स्वयं में खोया-खोया खुद में खुद को ढूंढ रहा हूँ

जब भी मैंने चलाना चाहा कितने रह सफ़र में आए
सबके अपने-अपने दर्शन ,सबने अपने गुण बतलाए
फिर भी सब के सब व्याकुल क्यों? मूर्त भाव से सोच रहा हूँ

सभी किताबों में करूणा है प्रेम -दया की गाथा है
बाहर कितनी चहल-पहल है भीतर-भीतर सन्नाटा है
मेरे दर पे खून के छीटे युग-युग से मैं पोंछ रहा हूँ

सब के सब पंडाल लगाए, सब ने अपने ग्रन्थ सजाए
सब में 'ढाई-आखर' ही था ,फिर क्यों जीवन व्यर्थ गवाए
युग की जर्जर लाल-चुनरिया जतन रखी न पहन सका हूँ

लोग पढाते पोथी-पतरा दिल की बात नहीं पढ़ता है
चेतनता की बातें करते मस्तिष्क में स्थिर जड़ता है
जल में बिम्ब ,बिम्ब में जल है अर्थ अभी तक खोज रहा हूँ

बूँद बनी या सिन्धु बना है? शून्य अथवा आकाश बने है ?
शब्दों के इस महानगर में कैसे कैसे न्यास बने हैं
यक्ष-प्रश्न रह गया अनुत्तरित खुद से खुद को पूछ रहा हूँ
मैं स्वयं में खोया-खोया ......

-आनंद --