गुरुवार, 14 मई 2009

गीत ; मैं स्वयं में खोया-खोया...


मैं स्वयं में खोया-खोया खुद में खुद को ढूंढ रहा हूँ

जब भी मैंने चलाना चाहा कितने  raah  सफ़र में आए
सबके अपने-अपने दर्शन ,सबने अपने गुण बतलाए
फिर भी सब के सब व्याकुल क्यों? मूर्त भाव से सोच रहा हूँ

सभी किताबों में करूणा है प्रेम -दया की गाथा है
बाहर कितनी चहल-पहल है भीतर-भीतर सन्नाटा है
मेरे दर पे खून के छीटे युग-युग से मैं पोंछ रहा हूँ

सब के सब पंडाल लगाए, सब ने अपने ग्रन्थ सजाए
सब में 'ढाई-आखर' ही था ,फिर क्यों जीवन व्यर्थ गवाए
युग की जर्जर लाल-चुनरिया जतन रखी न पहन सका हूँ

लोग पढाते पोथी-पतरा दिल की बात नहीं पढ़ता है
चेतनता की बातें करते मस्तिष्क में स्थिर जड़ता है
जल में बिम्ब ,बिम्ब में जल है अर्थ अभी तक खोज रहा हूँ

बूँद बनी या सिन्धु बना है? शून्य अथवा आकाश बने है ?
शब्दों के इस महानगर में कैसे कैसे न्यास बने हैं
यक्ष-प्रश्न रह गया अनुत्तरित खुद से खुद को पूछ रहा हूँ
मैं स्वयं में खोया-खोया ......

-आनंद --

1 टिप्पणी:

Pradeep Kumar ने कहा…

लोग पढाते पोथी-पतरा दिल की बात नहीं पढ़ता है
चेतनता की बातें करते मस्तिष्क में स्थिर जड़ता है
जल में बिम्ब ,बिम्ब में जल है अर्थ अभी तक खोज रहा हूँ

wah ji wah kya khoob likhaa hai