शनिवार, 16 मई 2009

एक समर्पण गीत ....

एक समर्पण गीत ....

चेतना हो जहाँ शून्य उस मोड़ पर
वेदना हो जहाँ मूक उस छोर पर
हँस उठे प्राण-मन खिल उठे रोम तन
गूँज भर दो मेरी बांसुरी में ....

भावना के सिमटने लगे दायरे
टूटने जब लगे प्रीत के आसरे
मैं पुकारूं तुझे श्वांस बन कर मिलो
जिन्दगी की सफ़र आख़िरी में ....

अर्चना के सभी मूल्य मिटने लगे
साधनायें बिना अर्थ लगाने लगे
फूल पूजा के बन कर बिखरने लगो
अर्ध निर्मित मेरे मंदिरों में ....

गंध ही जब नहीं फूल किस काम का !
जब न तुम ही जूडो नाम किस नाम का
गीत मेरे कभी लड़खडाने लगे
सुर मिलाना कि रस-माधुरी में ....

रूप क्या है , सजा कल सजे ना सजे
मांग क्या है , भरा कल भरे न भरे
शुभ मुहूरत मिलन की घड़ी देख कर
दान कर दो मेरी अंजुरी में .....

प्यार ही में रंगा तन रंगा मन रंगा
इन्द्रधनु भी रंगा सप्त रंग में रंगा
रंग ऐसा भरो जो कि मिट ना सके
अर्ध विकसित प्रणय-पंखुरी में ....

---आनंद

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