सोमवार, 18 मई 2009

कुछ मुक्तक

कुछ मुक्तक

पारदर्शी तेरा आवरण
कर न पाया तुझे संवरण
मैंने दर्शन बहुत कुछ पढ़ा
पढ़ न पाया तेरा व्याकरण
-- ० --

भावना का स्वरुपण हुआ
अर्चना का निमंत्रण हुआ
फूल क्या मैं धरूँ देवता !
----०-----

आज अपना हूँ मैं संस्मरण
तुम भले ही कहो विस्मरण
आज स्वीकार कर लो मेरी
जिंदगी का नया संस्करण

3 टिप्‍पणियां:

Udan Tashtari ने कहा…

बेहतरीन भावपूर्ण मुक्तक!!

रंजना ने कहा…

Waah !!

Atisundar kavita...sankshipt shabdon me gahan arth liye atisundar shabd rachna....Waah !!!

आनन्द पाठक ने कहा…

प्रिय रंजना जी
आप का ब्लॉग देखा बहुत सुन्दर है
आप ने rachanna सराही ,धन्यवाद

--आनंद