बुधवार, 20 मई 2009

हम बंजारे नगरी नगरी अपना कहाँ ठिकाना है
सुबह जलाए चूल्हा-चाकी शाम हुए उठ जाना है

दो दिन बाद पकी हैं रोटी ,धुँआ लग गई कोठी में
महलों वाले सोच रहे हैं ,झुग्गी वाले हेन्ठी में
सुबह-शाम की भाग-दौड़ में जो कुछ हासिल हो पाया
लाद चले हैं खटिया-मचिया छोड़ यहीं सब जाना हैं
हम बंजारे नगरी नगरी ....


आती है आवाज़ कहीं से दूर क्षितिज के पार गगन
धीरे-धीरे बढ़ता जाता अवचेतन मन मगन मगन
एक तमाशा मेरे अन्दर सभी तमाशों में शामिल
हो जाएगा खतम तमाशा एक दिशा सब जाना है
हम बंजारे नगरी नगरी ....


जितना मिला उसी में जीना उतना मेरा राज महल
माटी का घट रोना क्या! मन क्यूँ रहता विकल-विकल
नीचे धरती के सैया है ऊपर नीली छतरी है -
चंवर डुलाते पेड़ खड़े हैं अपना यही खजाना है
हम बंजारे नगरी नगरी ...


सबके अपने- अपने कुनबे,अपनी राम कहानी है
सबकी अपनी -अपनी डफली सबकी राग पुरानी है
ढाई-आखर' ही पढ़ने में बीत गई जब सारी उमरिया
जैसी ओढी रही चुनरिया वैसी ही धर जाना है
हम बंजारे नगरी नगरी ...

-आनंद

3 टिप्‍पणियां:

AlbelaKhatri.com ने कहा…

geet ne prabhavit kiya, is jaandar aur shandar post k liye badhai

आनन्द पाठक ने कहा…

खत्री जी!
सराहना व बधई के लिए धन्यवाद
--आनन्द

SWAPN ने कहा…

sabke apne apne kunbe.....................

wah. bahoot khoob. badhai.