शुक्रवार, 22 मई 2009

एक कविता : कितने पौरुष वीर .....

कितने पौरुष वीर पुरुष है !
हाथों में बंदूक लिए
नारी को निर्वसना कर के
हांक रहे है सीना ताने
मरा नहीं दुर्योधन अब भी
जिंदा है हर गाँव शहर में
अगर मरा है
'धर्मराज'का सत्य मरा है
'अर्जुन ' का पुन्सत्व मरा है
'भीम' का भीमत्व मरा है
दु:शासन तो अब भी जिंदा
अट्टहास कर हंसता-फिरता
हाथों में बंदूक लिए
पांचाली का चीर चीरता
क्या अंतर है ????
कुरुक्षेत्र हो ,बांदा हो , चौपारण हो
हमें प्रतीक्षा नहीं कि
कोई कृष्ण पुन: गीता का उपदेश सुनाए
अपना अपना कुरुक्षेत्र है
संघर्ष हमें ही करना होगा
हमे स्वयं ही लड़ना होगा
इसी व्यवस्था में रह कर
इन्द्र-प्रस्थ फिर गढ़ना होगा

-Anand.pathak-

1 टिप्पणी:

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

हम क्यों देखें अपना घर? औरों के घर देखेंगे, गरियाएंगे, अपने घर छुपे दुशासन को कभी ना पाएंगे।