गुरुवार, 14 मई 2009

एक गीत : मैं अँधेरा अभी पी रहा हूँ...

मैं अँधेरा अभी पी रहा हूँ भोर की इक किरण के लिए

वैसे मुझको भी मालूम था राज दरबार की सीढियां
वह कहाँ से कहाँ चढ़ गए ,तर गई उनकी दस पीढियां
मैं वहीँ का वहीँ रह गया उनकी नज़रों में ना आ सका
लेकिन सर को झुकाया नहीं एक मन की खुशी के लिए
मैं अँधेरा अभी पी रहा हूँ....

मोल सबकी लगाते चले हैं खोटे सिक्कों से वह तौल कर
एक मैं हूँ कि जी-मर रहा हूँ ,अपने आदर्शों पर ,कौल पर
जिंदगी की समर में खडा हूँ ,हार की जीत का प्रश्न नहीं
पावँ पीछे हटाया नहीं सत्य की आचरण के लिए
मैं अँधेरा अभी पी रहा हूँ....

आरती हैं उतारीं गई ,गुप्त समझौते जो कर लिए
रोशनी के लिए जो लड़े ,रात में खुदकुशी कर लिए
ना वह पन्ने हैं इतिहास के ना शहीदों की मीनार में
उसने जितना जिया आज तक एक मन की खुशी के लिए
मैं अँधेरा अभी पी रहा हूँ....

आप क्या हैं खरीदे मकाँ पे नाम का इक शिला-पट जड़े हैं
उनके सर पे ना छत हो सकी है सत्य -आदर्श से जो जुड़े हैं
जिंदगी ना मेरी भीख हैं ना किसी की यह सौगात हैं -
मैंने जितना जिया आजतक एक मन की खुशी के लिए
मैं अँधेरा अभी पी रहा हूँ....

कोई टिप्पणी नहीं: