गुरुवार, 14 मई 2009

एक गीत : किसी का प्रणय तन-मन हूँ ....

किसी का प्रणय तन-मन हूँ ,किसी की कल्पना भी हूँ

मैं किसी की एक वीणा- तार कम्पन
या किसी मनु का अनागत गहन चिंतन
किसी का अंक-शायी हूँ , किसी की कामना भी हूँ .
किसी का प्रणय तन-मन हूँ....

रात भर बंदी बनाए रही कलिका
देखती है सुबह उड़ना निठुर अलि का
कहीं अभिशप्त हूँ परित्यक्त ,कहीं आराधना भी हूँ .
किसी का प्रणय तन-मन हूँ....

कहीं सिन्दूर हूँ मैं चिर सुहागन का
किसी की एक पावन ज्योति आँगन का
किसी को मैं अपावन हूँ ,किसी की साधना भी हूँ
किसी का प्रणय तन-मन हूँ...

कल्प से जलता रहा दीपक सरीखा
पी रहा हूँ घन अँधेरा मैं किसी का
किसी को एक पत्थर भर ,किसी की अर्चना भी हूँ
किसी का प्रणय तन-मन हूँ...

मैं किसी को एक अनबूझी पहेली
औ प्रतीक्षा मैं कोई बैठी अकेली
किसी को मैं अयाचित हूँ ,किसी की याचना भी हूँ
किसी का प्रणय तन-मन हूँ...

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