रविवार, 17 मई 2009

एक ग़ज़ल : मोहन के बांसुरी की जैसे तान....

मोहन के बांसुरी की जैसे तान है ग़ज़ल
कोयल की कूक मीठी जैसी गान है ग़ज़ल

जैसे कि मां की गोद में सोया हुआ बच्चा
चेहरे पर हौले-हौले मुस्कान है ग़ज़ल

खिलते हुए कमल पे ठहरी हुई शबनम
छूने को मचलती हुई अरमान है ग़ज़ल

मिलते कभी सफर में जैसे दो अजनबी
परदेश में ज्यों अपनी पहचान है ग़ज़ल

फूलों की घाटियों में बहती हुई दरिया
बादे - सहर की जैसे उनवान है ग़ज़ल

जीवन के साधना में ऋचा मन्त्र-सी लगे
जैसे ऋषि-मुनि कोई ध्यान है ग़ज़ल

वह पूछती हैं हमसे ग़ज़ल कौन सी बला
तेरा रूप है ग़ज़ल मेरा ईमान हैं ग़ज़ल

7 टिप्‍पणियां:

ACHARYAJI KAHI ने कहा…

MAAN GAYE USTAB.
KYA KHOOB LIKHA H.
LINKC MERI MALE PAR FORWARD KARNE KA KASHAT KAR LIYA KARO.
ANCHORING MEIN BAHUT KHUB KAAM AAYEGI AISE MANBHAVAN PANKTIYA.
RAMESH SACHDEVA
hpsshergarh@gmail.com
hpsdabwali07@gmail.com

Udan Tashtari ने कहा…

मिलते कभी सफर में जैसे दो अजनबी
परदेश में ज्यों अपनी पहचान है ग़ज़ल


--बहुत खूब है सभी शेर.बधाई.

SWAPN ने कहा…

मोहन के बांसुरी की जैसे तान है ग़ज़ल
कोयल की कूक मीठी जैसी गान है ग़ज़ल

wah, sabhi sher lajawaab, dheron badhai.

venus kesari ने कहा…

बेहतरीन शेर
सुन्दर गजल

वीनस केसरी

आनन्द पाठक ने कहा…

स्वप्न जी/वीनस जी/उडन तश्तरी जी
आप सभी लोगो का उत्साह वर्धन के लिए बहुत बहुत धन्यवाद

आनन्द

Vikram singh ने कहा…

Bahut badhiya sir ji aap wakai kafi achchha likhte hai...

Aapki gazale khas tour pe pasand aayi.

vikrm singh ने कहा…

Aap bahut achchha likhte hai sir ...padhkar bahut maza aaya...khas tour pe gazalen.