गुरुवार, 14 मई 2009

एक ग़ज़ल : चांदी की तश्तरी ना...

चांदी की तश्तरी ना ,सौगात ना महल के
कुछ प्यार के हैं नग्मे, कुछ दर्द हैं ग़ज़ल के

तेरे घर के रास्ते में फिसलन भी कम नहीं है
फिर भी मैं आ रह हूँ बच-बच सँभल-सँभल के

तेरे दर पे कैसे आते ? मेरी ओढ़नी फटी थी
दिल को ना था गवारा आते की भेष बदल के

कभी जिन्दगी मुक्कमल नहीं हो सकी मुखातिब
कभी किस्स-ए-फना थे कभी बात थे अज़ल के

दिल को मिला सकूं तो तेरा घर समझ लिया
कोशिश तो ज़माने की बर्बाद-ओ-खलल के

मुझ पर कभी तो होगी उनकी नज़र इनायत
चरचे बहुत सुने हैं रहम-ओ-करम फज़ल के

आँखों खुली जो देखा 'आनंद' वह था सपना
देखेंगे अब हकीकी बंद आँखे कर असल के

-आनंद-

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