गुरुवार, 14 मई 2009

एक ग़ज़ल 01 : चांदी की तश्तरी में

221-----2122---//  221-----2122
बह्र-ए-मुज़ारिअ मुसम्मन अख़रब
मफ़ऊलु---फ़ाइलातुन..// मफ़ऊलु---फ़ाइलातुन
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चाँदी की तश्तरी में ,नज़राने कब महल के ?
शामिल मेरे क़लम में,  कुछ दर्द हैं ग़ज़ल के

किस को मिली यहाँ पर ,है ज़िन्दगी मुकम्मल
दो चार दिन खुशी के ,बाक़ी हैं  सब ख़लल के

दुनिया हसीन लगती ,देखा कभी जो होता
अपनी अना से बाहर ,आता जो तू निकल के

वादे ,वफ़ा ,मुहब्बत ,बातें है सब किताबी
आदाब अब यही है शायद कि आजकल के

दिल को न था गवारा ,लेकर फ़टी सी चादर
जाते तुम्हारे दर पे ,कुछ भेष हम बदल के

बेदार जो भी देखा इक ख़्वाब था भरम था
है देखना हक़ीक़त ,अब राह-ए-मर्ग चल के

तेरी गली में ’आनन’,फ़िसलन भी कम नहीं है
रह-ए-रास्त हूँ मैं फिर भी, बच बच सँभल सँभल के


-आनन्द.पाठक-
[सं 14-07-18]
posted on FB 140718

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