रविवार, 17 मई 2009

एक गीत : फ़िर कहीं दूर आँगन में ....

फ़िर कहीं दूर आँगन में धुँआ उठा ,कहीं 'सीता' जली 'सावित्री' जली
दो ह्रदय के अधूरे मिलन जल गए
दो नयन के सजीले सपन जल गए
प्यार पूजा से क्यों वासना हो गई
फूल जूडा के जूडे में ही जल गए
आदमी ने जलाया उसे आज तक ,कहीं 'गीता' जली गायत्री जली

मांग सिन्दूर का रंग पीला हुआ
आदमी इस तरह क्यूँ हठीला हुआ
फूल आँचल में भर न सका प्यार के
जो दिया भी तो जीवन कंटीला हुआ
आदमी की सडन्ध सोच की क्या कहें ! एक 'कुंती' जली 'दमयंती' जली

क्या हुए वो शपथ सात फेरे हुए ?
यह सुबह ही सुबह क्यों अंधेरे हुए
हाथ अग्नि-शलाका लिए आदमी
घर के आँगन की 'तुलसी'को घेरे हुए
थाल अर्चन की थी क्यूँ जहर हो गई ,कहीं 'रोली' जली एक 'कुमकुम' जली

अंखियों में सजा नेह कजरा जला
वेणियों में गुंथा प्यार गजरा जला
थी किसी के कलाई की राखी जली
एक ममता जली स्नेह अंचरा जला
पाँव महावर थे पेट्रोल में धुल गए, कहीं 'गंगा जली 'गंगोत्री' जली

एक नारी जली प्रीति बिंदिया जली
एक सुहागिन की पावन बिछिया जली
'उर्मिला' की प्रतीक्षा घडी जल गई
एक बाबुल की प्यारी बिटिया जली
चंद पैसों का भूखा हुआ आदमी ,कहीं 'राधा'जली 'राधिका ' जली

ना ही उषा जली ना मनीषा जली
जो जले आदमी के ही चहरे जले
बात करते हैं इंसानियत की वही
अंत: दिल के जले बाहर लगते भले
एक दुल्हन के नैहर की चुनरी जली एक सभ्यता जली एक संस्कृति जली
फ़िर कहीं दूर आँगन में ........

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