सोमवार, 8 जून 2009

एक गज़ल 05 : तुम मिली तो मिली ज़िन्दगी....

फ़ाइलुन--फ़ाइलुन--फ़ाइलुन   
212--------212-------212 
बह्र-ए-मुतदारिक मुसद्दस सालिम
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ग़ज़ल

तुम मिली तो मिली जिन्दगी
सांस लेने लगी जिन्दगी

रूह अपनी निखरने लगी
आईने-सी लगी जिन्दगी

कितने सपने लगी देखने
चार दिन की बची जिन्दगी

उनके दीदार की जुस्तजू
मेरी दीवानगी जिन्दगी

 है अभी  इश्क की इब्तिदा
और बेख़ुद हुई  ज़िन्दगी

जब न तुम ही मेरे हमसफ़र
बेसबब सी लगी जिन्दगी

अब न जायेगा ’आनन’ कहीं
छोड़ तेरी गली ज़िन्दगी

-आनन्द.पाठक--

[सं 19-05-18]

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