गुरुवार, 2 जुलाई 2009

एक ग़ज़ल : ज़माने की अगर हम....

ज़माने की अगर हम बेरुखी से डर गए होते

न होती आग दिल में तो कभी के मर गए हो्ते



अगर हम ज़ब्त ना करते सदा-ए-दिल गमे-उल्फ़त

जो टकराते पहाड़ों से पिघल पत्थर गए होते



हमारा ज़िक्र भूले से कोई जो कर गया होता

यकीनन उनकी आँखों में भी आँसू भर गए होते



अगर बुतख़ाने से पहले तिरी महफ़िल नहीं मिलती

सुकूँ दिल को कहाँ मिलता कि किसके दर गए होते



सभी के वास्ते ’आनन्द’ ज़ुदा राहें यहाँ सबकी

किसी भी रास्ते जाते तुम्हारे घर गए होते



--आनन्द

5 टिप्‍पणियां:

M Verma ने कहा…

बेहतरीन गज़ल.
किसी भी रास्ते जाते तुम्हारे घर गए होते
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वाह क्या ज़ज़्बात है

श्रद्धा जैन ने कहा…

हमारा ज़िक्र भूले से कोई जो कर गया होता

यकीनन उनकी आँखों में bhi आँसू भर गए होते

bahut hi sunder sher kaha hai

आनन्द पाठक ने कहा…

आ० श्रद्धा जी
मूल पाठ में ’भी’ शब्द था परन्तु टाइपिंग में भूल वश छूट गया था
आप ने इंगित किया बहुत -बहुत धन्यवाद
ग़ज़ल की सराहना के लिए एक बार पुन:...
सादर
-आनन्द

आनन्द पाठक ने कहा…

आ० वर्मा जी
ग़ज़ल की सराहना केलिए बहुत-बहुत धन्यवाद
सादर
-आनन्द

mahashakti ने कहा…

उम्‍दा गज़ल, गज़ल का पारखी नही हूँ किन्‍तु पढ कर अच्‍छा लगा।