रविवार, 9 अगस्त 2009

मुक्तक 02

कुछ मुक्तक


हो भले तीरगी रास्ता पुरखतर
दूर आती न मंज़िल कहीं हो नज़र
हम चिरागों का क्या है जहाँ भी रखो
हम वहीं से करें रोशनी का सफ़र


ज़माने से पूछो न बातें हमारी
गमो-दर्दे-दिल की वो रातें हमारी
अगर पूछना है तो पूछो हमी से
ए ’आनन’! क्यूं नम है ये आँखें तुम्हारी?


लफ़्ज़ होंठो पे आ लड़खड़ाने लगे
जिसको कहने में हमको ज़माने लगे
नये ज़माने की कैसी हवा बह चली
दो मिनट में मोहब्ब्त जताने लगे


चन्द लम्हे भी क्या हसीं  होते
आप दिल के मिरे मकीं  होते
ज़िन्दगी और भी सँवर जाती
आप मेरे जो  हमनशीं होते


--आनन्द