रविवार, 9 अगस्त 2009

कुछ मुक्तक

कुछ मुक्तक


हो भले तीरगी रास्ता पुरखतर
दूर आती न मंज़िल कहीं हो नज़र
हम चिरागों का क्या है जहाँ भी रखो
हम वहीं से करें रोशनी का सफ़र


ज़माने से पूछो न बातें हमारी
गमो-दर्दे-दिल की वो रातें हमारी
अगर पूछना है तो पूछो हमी से
’आनन्द’ नम क्यूँ है आँखे तुम्हारी?


लफ़्ज़ होंठो पे आ लड़खड़ाने लगे
जिसको कहने में हमको ज़माने लगे
नये ज़माने की कैसी हवा बह चली
दो मिनट में मोहब्ब्त जताने लगे

--आनन्द

2 टिप्‍पणियां:

M VERMA ने कहा…

लफ़्ज़ होंठो पे आ लड़खड़ाने लगे
जिसको कहने में हमको ज़माने लगे
behatareen rachana. zazbat sunder

योगेश स्वप्न ने कहा…

teenon muktak shaandaar , teesra vishesh bhaya. badhaai.