शुक्रवार, 27 नवंबर 2009

एक गीत: जीवन के सुबह की....

एक गीत: जीवन के सुबह की....

जीवन के सुबह की लिखी हुई पाती
मिलती है शाम ढले मुझको गुमनाम

पूछा है तुमने जो मइया का हाल
कमजोरी खाँसी से अब भी बेहाल
लगता है आँखों में है मोतियाबिन
बोलो तुम्हारी है कैसी ससुराल?

चार-धाम करने की हठ किए बैठी
खटिया पर पड़े-पड़े लेती हरिनाम

मईया से कहना कि ’मुनिया’ भली है
दूधो नहाई और ,पूतो फली है
सासू बनाने की चाहत अधूरी -
विधिना विधान की बस बातें खली है

अगले जनम की क्या बातें अभी से
मइया से कह देना हमरा परनाम

अब की जो सावन में जाना हो गाँव
बचपन की यादें औ’ कागज की नाव
मिल कर जो बाँधे थे मन्नत के धागे‘
धूप सी चुभेगी उस बरगद की छाँव

सावन के झूलों की यादें सताती -
अब भी क्या लिख-लिख मिटाती हो नाम?

सुनते हैं , लाए हो गोरी अंग्रेजन
इंगलिश में गुटुर-गूँ ,चलती है बन-ठन
बन्दर के गले पड़ी मोती की माला
ऊँट ने गले पहनी बिल्ली की लटकन
धत पगली !क्यों छेड़े मुझको फ़िर आज?
अच्छा हुआ तुमने जो लिखा नहीं नाम

छोड़ो सब बातें ,सुनाओ कुछ अपनी
कैसे हैं "वो" और बहुएँ हैं कितनी ?
नाती औ’ पोतों को दादी के किस्से
सुनाना, बताना न बातें कुछ अपनी

पोतों संग गुज़रेगी बाकी उमरिया
बहुएँ है खाने लगी फ़िर कच्चे आम

-आनन्द

3 टिप्‍पणियां:

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ ने कहा…

जिंदगी का सजीव चित्र है आपकी कविता।

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क्या धरती की सारी कन्याएँ शुक्र की एजेंट हैं?
आप नहीं बता सकते कि पानी ठंडा है अथवा गरम?

पी.सी.गोदियाल ने कहा…

अब की जो सावन में जाना हो गाँव
बचपन की यादें औ’ कागज की नाव
मिल कर जो बाँधे थे मन्नत के धागे‘
धूप सी चुभेगी उस बरगद की छाँव

Bahut sundar paathak sahaab, koi lautaa de mere beete hue din !!

योगेश स्वप्न ने कहा…

gaon ki mati ki gandh aa rahi hai rachna men se. umda.