शनिवार, 19 दिसंबर 2009

ईमान कहाँ देखा .....!

ईमान कहाँ देखा.....



ईमान कहाँ देखा ,सत्यवान कहाँ देखा !

मैने देखे शहर कितने इंसान कहाँ देखा !



अबतक जो मिले मुझसे,थे दर्द भरे चेहरे

उपमेय बहुत देखे ,उपमान कहाँ देखा !



गमलों की उपज वाले माटी से कटे थे लोग

थे नाम बहुत ऊँचे,पहचान कहाँ देखा !



अंधी से गली का सफ़र जीवन का सफ़रनामा

फँसने के तरीके थे ,समाधान कहाँ देखा !



हँसने की प्रतीक्षा में क्या क्या न सहे हमने

अभिशाप बहुत ढोए वरदान कहाँ देखा !



पत्थर की तरह चेहरे ,चेहरों पे खिंची रेखा

आँखों में नीरवता ,मुस्कान कहाँ देखा !



अमृत की प्रतिष्ठा में आचरण बहुत देखे

शंकर की तरह लेकिन विषपान कहाँ देखा !



-आनन्द.पाठक

3 टिप्‍पणियां:

योगेश स्वप्न ने कहा…

अमृत की प्रतिष्ठा में आचरण बहुत देखे

शंकर की तरह लेकिन विषपान कहाँ देखा !

behatareen abhivyakti.

आनन्द पाठक ने कहा…

आ० योगेश जी
सराहना के लिए धन्यवाद
सादर
-आनन्द.पाठक

परमजीत बाली ने कहा…

बहुत सुन्दर रचना है।बधाई स्वीकारें।

अमृत की प्रतिष्ठा में आचरण बहुत देखे
शंकर की तरह लेकिन विषपान कहाँ देखा !