आँधियों से न कोई गिला कीजिए
लौ दिए की बढ़ाते रहा कीजिए
सर्द रिश्ते भी इक दिन पिघल जाएंगे
गुफ़्तगू का कोई सिलसिला कीजिए
दर्द-ए-जानां भी है,रंज-ए-दौरां भी है
क्या ज़रूरी है ख़ुद फ़ैसला कीजिए
मैं वफ़ा की दुहाई तो देता नहीं
आप जितनी भी चाहे जफ़ा कीजिए
हमवतन आप हैं ,हमज़बां आप हैं
दो दिलों में न यूँ फ़ासला कीजिए
आप गै़रों से इतने जो मस्रूफ़ हैं
काश !’आनन्द’ से भी मिला कीजिए
-आनन्द
मस्रूफ़ = व्यस्त
रविवार, 17 जनवरी 2010
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10 टिप्पणियां:
45बहुत खूब आनंद जी एक बेहतरीन गजल मै तो आप का नियमित पाठक हूँ बस सिकायत है आप से एक
आप गै़रों से इतने जो मस्रूफ़ हैं
काश !’प्रवीण ’ से भी मिला कीजिए
सादर
प्रवीण पथिक
9971969084
wah.wah. bahut achcha.
gazal pasand aayee ... badhaayee iske liye
arsh
आँधियों से न कोई गिला कीजिए
लौ दिए की बढ़ाते रहा कीजिए
सर्द रिश्ते भी इक दिन पिघल जाएगी
गुफ़्तगू का कोई सिलसिला कीजिए
wah wah behatareen lajawaab.
वाह !वाह !
बहुत खूब !
बधाई !
rochak aur sundar
आँधियों से न कोई गिला कीजिए
लौ दिए की बढ़ाते रहा कीजिए ..
सार्थक लिखा है ....... दिल की आस नही बुझनी चाहिए ....... गम का अंधेरा तो आएगा उसे आने दें ...
लो, हमने तो अपनी ट्टिपणी वहीं मेल पर ही कर दी.....और संजो कर भी नहीं रक्खी.... आनन्द नाराज न हों... रचना अच्छी है.
आ० दिगम्बर जी/साधक जी
उत्साह वर्धन के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद
सादर
-आनन्द.पाठक
aik achhee ghazal par mubaarakbaad qabool karen.
PK Swami
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