रविवार, 21 फ़रवरी 2010

एक गीतिका >वातानुकूलित आप ने .......

एक गीतिका: वातानुकूलित आप ने...

वातानुकूलित आप ने आश्रम बना लिए
सत्ता के इर्द-गिर्द ही धूनी रमा लिए

"दिल्ली" में बस गए तपोवन को छोड़ कर
"साधु" भी कैसे कैसे चेहरे चढ़ा लिए

गूँगों की बस्तियों में अंधों की भीड़ थी
हर युग में आप खोटे सिक्के चला लिए

यह आप की कला थी या कोई करिश्मा
धतूरे के पेड़ पर भी चन्दन उगा लिए

जो श्लोक-ऋचा-मन्त्र थे नीलाम कर दिए
जो धर्म-कर्म शेष ,दलाली में खा लिए

आए जो कटघरे में चेहरे पे ना शिकन
"साहब" ने कारागार में ही घर बना लिए

है मौन आप का भी वक्तव्य से मुखर
कहने को क्या बचा? सब सुन-सुना लिए

-आनन्द

4 टिप्‍पणियां:

M VERMA ने कहा…

आए जो कटघरे में चेहरे पे ना शिकन
"साहब" ने कारागार में ही घर बना लिए
सही पकड़ा
सुन्दर रचना

योगेश स्वप्न ने कहा…

bahut sunder kataksh. behatareen prastuti.

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत उम्दा रचना.

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी ने कहा…

आप के ब्लाग पर संभवतः पहली बार ही आना हुआ, पर बहुत ही अच्छी रचनायें पढ़ने को मिली......बहुत बहुत बधाई.....