शुक्रवार, 30 अप्रैल 2010

एक गीतिका : जड़ो तक साजिशें गहरी ......

एक गीतिका : जड़ों तक साज़िशें गहरी.....

जड़ों तक साज़िशे गहरी सतह तक हादसे थे
जहाँ बारूद की ढेरी वहीं पर घर बसे थे

उनकी आदतें थी आस्माँ ही देखते चलना
ज़मीं पाँवों के नीचे खोखली थी ,बेख़बर थे

बहुत उम्मीद थी उनसे ,बहुत आवाज़ दी हमने
कि जिनको चाहिए था जागना, सोए हुए थे

ज़रूरत रोशनी की थी ,अँधेरा ले कर आए हैं
वह अपने आप की परछाईयों से यूँ डरे थे

बहुत फुँफकार करते थे ,बहुत हुंकार थी जिनकी
ज़रूरत जब पड़ी आवाज़ कितने बेअसर थे

लगी जब उँगलियाँ उठने हुई दीवार में कम्पन
इमारत की अरे ! बुनियाद कितने हिल चुके थे

बहुत इच्छा हमारी थी कि ’दर्शन’ आप के होते
मगर जब भी मिले तो आप पर चेहरे चढ़े थे

-आनन्द

2 टिप्‍पणियां:

दिलीप ने कहा…

लगी जब उँगलियाँ उठने हुई दीवार में कम्पन
इमारत की अरे ! बुनियाद कितने हिल चुके थे

in panktiyo ne sab kuch keh diya

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत बढ़िया आनन्द जी.