एक ग़ज़ल : रक़ीबों से क्या......
रक़ीबों से क्या आप फ़रमा रहे हैं !
हमें देख कर और घबरा रहे हैं
इलाही! मेरे यह अदा कौन सी है !
कि छुपते हुए भी नज़र आ रहे हैं
उन्हें आईना क्या ज़रा सा दिखाया
वो पत्थर उठाए इधर आ रहे हैं
सुनाया जो उनको ग़मों का फ़साना
वह झुझँला रहे है, वो शरमा रहे हैं
मुहब्बत का हासिल तो आह-ओ-फ़ुगाँ हैं
ये कह कह के वो हम को समझा रहे हैं
कहानी पुरानी है उल्फ़त की "आनन्द"
हमी तो नहीं हैं जो दुहरा रहे हैं
-आनन्द-
रविवार, 2 मई 2010
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3 टिप्पणियां:
वाह!!बहुत उम्दा गजल है आनंद जी। बधाई स्वीकारें।
सुनाया जो उनको ग़मों का फ़साना
वह झुझँला रहे है, वो शरमा रहे हैं
वाह! बहुत खूब!
कहानी पुरानी है उल्फ़त की "आनन्द"
हमी तो नहीं हैं जो दुहरा रहे हैं
maza aa gaya
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