गुरुवार, 6 मई 2010

एक गीतिका : तुम भीड़ खरीदी देखे हो ....

तुम भीड़ खरीदी देखे हो ,ज़ज्बात नहीं देखा होगा
सत्ता की हिला दें बुनियादें ,उन्माद नहीं देखा होगा

जो शीश झुका के बैठे हैं ,वो बिके हुए दरबारी हैं
आदर्शों पर मर-मिटने का उत्साह नहीं देखा होगा

तुम भीख बाँटते फिरते हो वादे झू्ठे आश्वासन के
खाली पेटों की आहों का अभिशाप नहीं देखा होगा

जो साथ तुम्हारे चलते है सत्ता के सुविधा-भोगी हैं
गूँगों की ज़मायत देखे हो ,हुंकार नहीं देखा होगा

जब तक है किनारों में बहती इक सीधी-सादी नदिया है
तटबन्धें तोड़ कर बहने का सैलाब नहीं देखा होगा

आवाज़ लगाने से पहले ,सोए को जगाना वाज़िब है
लोगों के लब सी देने का ,अंजाम नहीं देखा होगा

गोली में नहीं,लाठी में नहीं,कुछ प्यार में ताक़त होती है
पत्थर के शहर में फूलों की औक़ात नहीं देखा होगा

-आनन्द

1 टिप्पणी:

शारदा अरोरा ने कहा…

बहुत बढ़िया , वैसे तो पूरी रचना ही सुन्दर है मगर ये पंक्तियाँ बहुत अच्छी लगीं
आवाज़ लगाने से पहले ,सोए को जगाना वाज़िब है
लोगों के लब सी देने का ,अंजाम नहीं देखा होगा
'पत्थर के शहर में फूलों की औक़ात नहीं देखा होगा '
अगर इसे 'पत्थर के शहर में फूलों की औकात को न देखा होगा ' कर लें तो ज्यादा जमेगा क्योंकि औकात के साथ तो न देखी होगी बोला जाता है ।