शनिवार, 22 मई 2010

एक ग़ज़ल : जूनून-ए-इश्क में हमनें ......

मफ़ाईलुन---मफ़ाईलुन---मफ़ाईलुन---मफ़ाईलुन
1222----------1222---------1222------1222
बह्र-ए-हज़ज मुसम्मन सालिम
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एक ग़ज़ल

जुनून-ए-इश्क़ में हमने न जाने क्या कहा होगा !
थे इतने बेख़ुदी में गुम कि हम को क्या पता होगा

मैं अपने इज़्तिराब-ए-दिल से रहता पूछता अकसर
कि जितना चाहता हूँ  ,क्या वो  उतना  चाहता होगा

हमें मालूम है नाकामी-ए-दिल, हसरत-ए-उल्फ़त
हमें तो आख़िरी दम तक वफ़ा से वास्ता होगा

सभी तो रास्ते जाते तुम्हारी ही गली हो कर
वहाँ से लौट आने का न कोई रास्ता होगा

ख़याल-ओ-ख़्वाब में जिस के, कटी ये ज़िन्दगी अपनी
मैं उसको जानता हूँ, क्या मुझे वो  जानता होगा ?

जो उसको ढूँढने निकला ,तो खुद भी खो गया"आनन"
जिसे ख़ुद में नहीं पाया , वो बाहर ला-पता होगा

-आनन्द.पाठक

इज़्तिराब-ए-दिल = दिल की बेचैनी/बेचैन दिल

[सं 19-05-18]

3 टिप्‍पणियां:

राकेश कौशिक ने कहा…

जुनून-ए-इश्क़ में हमने न जाने क्या "किया" होगा!
बहुत खूब - लाजवाब ग़ज़ल

सतीश चंद्र सत्यार्थी ने कहा…

"ख़याल-ओ-ख़्वाब में जिस के, कटी है ज़िन्दगी अपनी
मैं उसको जानता हूँ, क्या वो मुझ को जानता होगा ?"

... क्या बात है!!!!

आनन्द पाठक ने कहा…

आ० कौशिक जी/सत्यार्थी जी
ग़ज़ल की सराहना के लिए धन्यवाद
सादर
आनन्द.पाठक