शुक्रवार, 30 जुलाई 2010

एक ग़ज़ल : चलो छोड़ देंगे .....

एक ग़ज़ल : चलो छोड़ देंगे......

चलो छोड़ देंगे क़राबत की बातें
मगर कैसे छूटेंगी उल्फ़त की बातें ?

ये तर्क-ए-मुहब्बत की बातें ,ख़ुदाया !
क़यामत से पहले क़यामत की बातें

कहाँ ज़िन्दगानी में मिलता है कोई
जो करता हो दिल से रफ़ाक़त की बातें

कभी आस्माँ से उतर आइए तो
करेंगे ज़मीनी हक़ीक़त की बातें

जिसे गुफ़्तगू का सलीक़ा नहीं है
वो ही कर रहा है ज़हानत की बातें

अजी !छोड़िए भी यह शिकवा शिकायत
कहीं बैठ करते है राहत की बातें

अरे! रिन्द "आनन" को क्या हो गया है!
कि ज़ाहिद से करता है जन्नत की बातें

-आनन्द
क़्रराबत =समीपता ,साथ-साथ उठना बैठना
तर्क-ए-मुहब्बत= मुहब्बत छोड़ना
रफ़ाकत =दोस्ती
रिन्द =मद्दप/शराबी

शनिवार, 17 जुलाई 2010

ग़ज़ल : तुम को खुदा कहा है .....

तुमको ख़ुदा कहा है किसने ? पता नहीं है
दिल ने न कह दिया हो ! हमने कहा नहीं है

दर पर तिरे न आऊँ ,सर भी नहीं झुकाऊँ !
दुनिया में आशिक़ी की ऐसी सजा नहीं है

पुरतिश्नगी ये मेरी ,जल्वा नुमाई तेरी
मेरी ख़ता भले हो , तेरी ख़ता नहीं है

कब ये जुबाँ खुली है तेरी सितमगरी से
ऐसा कभी न होगा ,ऐसा हुआ नहीं है

वो इश्क़ के सफ़र में ,राही नया नया है
आह-ओ-फ़ुगाँ ,जुनूँ की हद जानता नहीं है

ऐसा नहीं है कोई जो इश्क़ का न मारा
जिसकी न आँख नम हो जो ग़मजदा नहीं है

उल्फ़त का यह सफ़र भी कैसा अजब सफ़र है!
जो एक बार जाता वो लौटता नहीं है

किसके ख़याल में तुम, यूँ गुमशुदा हो ’आनन’?
उल्फ़त की मंज़िलों का तुमको पता नहीं है

-आनन्द

शुक्रवार, 2 जुलाई 2010

ग़ज़ल : ग़म-ए-दौराँ से.....

ग़ज़ल : ग़म-ए-दौराँ से .....

ग़म-ए-दौराँ से मेरी सिलसिला है
तुझे ऐ ज़िन्दगी ! फिर क्या गिला है?

वो जिसके इश्क़ में दिल मुब्तिला है
वो ही पूछे " मुहब्बत क्या बला है "?

मिरे सर से तुम्हारी आस्ताँ तक
तुम्हीं कह दो कि कितना फ़ासला है ?

तिरे जानिब से तूफ़ान-ए-जफ़ा हैं
मिरे जानिब चिराग़-ए-हौसला है

नज़र आती नहीं मंज़िल कहीं भी
अजब ये ज़िन्दगी का क़ाफ़िला है?

हमें दुनिया से क्या लेना है "आनन"!
हमें तुम क्या मिले सब कुछ मिला है

-आनन्द