रविवार, 22 अगस्त 2010

एक ग़ज़ल : न पर्दा उठेगा .....

एक ग़ज़ल ; न पर्दा उठेगा ....

न पर्दा उठेगा , न दीदार होगा
तो सज्दा तिरे दर पे सौ बार होगा

तिरे अंजुमन में हमीं जब न होंगे
तो फिर कौन हम-सा तलबगार होगा

बहुत दिन हुए हैं कि हिचकी न आई
यक़ीनन मिरा यार बेजार होगा

मुहब्बत है कोई तमाशा नहीं है
सरेआम मुझसे न इजहार होगा

दिल-ए-नातवाँ क्यों तू घबरा रहा है ?
मसीहा है ख़ुद वो न बीमार होगा

जो पर्दा उठेगा तो दुनिया कहेगी
ज़माने में ऐसा कहाँ यार होगा !

वो जिस दिन मिरे हम सफ़र होंगे ’आनन’
सफ़र ज़िन्दगी का न दुश्वार होगा

-आनन्द

2 टिप्‍पणियां:

रंजना ने कहा…

वाह...वाह...वाह...

बेहतरीन !!!!

प्रेम रस पगी यह रचना सहज ही पाठक के ह्रदय तक पहुँचने में सक्षम है...

ana ने कहा…

ati sundar ,,,,shabdo par aapki pakad achchhi hai.............