एक ग़ज़ल : संदिग्ध आचरण है ......
संदिग्ध आचरण है , खादी का आवरण है
’रावण’ कहाँ मरा है ,’सीता’ का अपहरण है
जो झूठ के हैं पोषक दरबार में प्रतिष्ठित
जो सत्य के व्रती हैं वनवास में मरण है
शोषित,दलित व पीड़ित,मन्दिर कभी व मस्ज़िद
नव राजनीति का यह संक्षिप्त संस्करण है
ज़िन्दा कभी बिकेगा ,कौड़ी से कम बिकेगा
अनुदान लाश पर है ,भुगतान अपहरण है
सरकार मूक दर्शक ,शासन हुआ अपाहिज
सब तालियाँ बजाते भेंड़ों सा अनुसरण है
’रोटी’ की खोज बदले ,’अणु-बम्ब’ खोजते हैं
इक्कीसवीं सदी में दुनिया का आचरण है
हर शाम थक मरा हूँ ,हर सुबह चल पड़ा हूँ
मेरी जिजीविषा ही आशा की इक किरण है
-आनन्द
रविवार, 19 सितम्बर 2010
शनिवार, 11 सितम्बर 2010
एक ग़ज़ल : वह उसूलों पर चला है ....
एक ग़ज़ल : वह उसूलों पर चला है......
वह उसूलों पर चला है उम्र भर
साँस ले ले कर मरा है उम्र भर
जुर्म इतना है खरा सच बोलता
कटघरे में जो खड़ा है उम्र भर
पात केले की तरह संवेदना
वो बबूलों पर टंगा है उम्र भर
मुख्य धारा से अलग धारा रही
अपनी दुनिया में जिया है उम्र भर
घाव दिल के जो दिखा पाता अगर
स्वयं से कितना लड़ा है उम्र भर
राग दरबारी नहीं है गा सका
इस लिए सूली चढ़ा है उम्र भर
-आनन्द
वह उसूलों पर चला है उम्र भर
साँस ले ले कर मरा है उम्र भर
जुर्म इतना है खरा सच बोलता
कटघरे में जो खड़ा है उम्र भर
पात केले की तरह संवेदना
वो बबूलों पर टंगा है उम्र भर
मुख्य धारा से अलग धारा रही
अपनी दुनिया में जिया है उम्र भर
घाव दिल के जो दिखा पाता अगर
स्वयं से कितना लड़ा है उम्र भर
राग दरबारी नहीं है गा सका
इस लिए सूली चढ़ा है उम्र भर
-आनन्द
सदस्यता लें
संदेश (Atom)







