गुरुवार, 15 दिसंबर 2011

एक ग़ज़ल 25 : चुनावों के मौसम जो आने लगे---

-122---122---122---122
फ़ऊलुन--फ़ऊलुन--फ़ऊलुन--फ़ऊलुन
बह्र-ए-मुतक़ारिब मुसम्मन सालिम
------------------------------------------
एक चुनावी ग़ज़ल

चुनावों के मौसम जो आने लगे हैं
’सुदामा’ के घर ’कृश्न’ जाने लगे हैं

जिन्हें पाँच वर्षों से देखा नहीं ,पर
वही ख़ुद को ख़ादिम बताने लगे हैं

हुई जिनकी ’टोपी’ है मैली-कुचैली
सफ़ाई के माने  सिखाने लगे हैं

पुराने सपन सब हवा हो गए जब
नये ख़्वाब फ़िर से दिखाने लगे हैं

मेरी झोपड़ी को जला देने वालो
बनाने में इसको ज़माने लगे हैं

हमें उनकी नीयत पे शक है ,न शुबहा
 मगर वो नज़र क्यों चुराने लगे हैं?

कहाँ जाके मिलते हम ’आनन’किसी से
यहाँ सब मुखौटे चढ़ाने लगे हैं


-आनन्द.पाठक
[नोट कृश्न = कृष्ण]

[सं 02-06-18]

शनिवार, 5 नवंबर 2011

एक गीत : मैं वो गीत नहीं गाता हूं......

शब्दों की नक़्क़ाशी केवल, भाव गीत के अलग-थलग हों
दिल से दिल की राह न निकले मैं वो गीत नहीं गाता हूँ

दिल में तो दीवार खड़ी है चेहरे पर मुस्कान दिखाते
हानि-लाभ की गणना कर के फिर कोई एहसान जताते
गली काठ की हांडी में है कितनी बार पकाए खिचड़ी
दीन-धरम के बातें करते नगर नगर शमशान बनाते

मस्जिद-मन्दिर वाली राहें हो जितनी भी पाक पवित्रम
नफ़रत की गलियों से गुज़रे ,मैं उस राह नहीं जाता हूँ

झूठ गवाही देता फिरता राज भवन के गलियारों में
सत्य सफाई देते देते तोड़ दिया दम उँजिया्रों में
कदाचार की महिमा मण्डित करने वाले मिले हज़ारों
सदाचार की गरिमा हमने छोड़ दिया ख़ुद अँधिया्रों में

मिथ्या आडम्बर के मेले झूठा करता नंगा नर्तन -
चाहे जितनी बजे तालियाँ ,खुद को सहज नहीं पाता हूँ

’वोट-बैंक’ की राजनीति में "बुधना" इक सामान हो गया
जब चाहे तब मोल लगा लो कितना यह आसान हो गया
तपे-तपाये लोग यहाँ भी सत्ता-कुर्सी की माया में -
निष्ठा ऐसे बदलें जैसे अन्दर का परिधान हो गया

आदर्शों के थोथे नारे आँखों में घड़ियाली आँसू
मैं फेंके सिक्कों की ख़ातिर चारण-गीत नहीं गाता हूँ
मैं वो गीत नहीं गाता हूँ..............................

आनन्द.पाठक

[revised 02-06-18]

रविवार, 7 अगस्त 2011

एक गीत : यह तुम्हारा प्रणय हठ है ......

एक गीत : यह तुम्हारा प्रणय हठ है...

यह तुम्हारा प्रणय-हठ है ,एक तरफा प्यार क्या है !

वह तुम्हारी कल्पना थी जो मुझे साकार माना
और अपनी ग़लतियों का भी मुझे आधार माना
जो अधूरी प्यास है वह ख़ुद-ब-ख़ुद तुमने बढ़ाई
मधु-मिलन हो या विरह मैंने सदा आभार माना
इस अधूरी प्यास का तुम ही कहो विस्तार क्या है ?
यह तुम्हारा प्रणय-हठ है........

क्या नहीं मालूम तुम को प्रेम की है राह दुष्कर
क्या समझ कर आ गये दो-चार पोथी-पत्र पढ़ कर
स्वयं का अस्तित्व खोना शर्त है पहली यहाँ की
वो ही पहुँचा आख़िरी तक जो जिया हर रोज़ मर कर
इस अयाचित भेंट पर मेरा भला अधिकार क्या है ?
यह तुम्हारा प्रणय-हठ है......

स्वयं को कर के समर्पित मैं सदा गर्वित रही हूँ
हर चरण अनुगामिनी बन मैं सदा हर्षित रही हूँ
’चन्द्र’ थे या ’इन्द्र’ थे, हर काल में पूजित रहे क्यों?
मैं ही ’पाषाणी’ बनी ,नारी रही,शापित रही हूँ
ॠषि प्रवर! उस दण्ड के औचित्य का आधार क्या है ?
यह तुम्हारा प्रणय-हठ है....

मैं सृजन की केन्द्र-विन्दु,शक्ति हूँ ,संहार हूँ मैं
तप्त-मन जलते बदन पर शबनमी बौछार हूँ मैं
मैं ही ’अनसूया" बनी मैं ही बनी रण-चण्डिका भी
या तुम्हारे रूठने पर इक सरल मनुहार हूँ मैं
जब न अन्तर्मन खिले तो प्रकृति का श्रॄंगार क्या है !
यह तुम्हारा प्रणय-हठ है....

झांक कर देखा नहीं तुमने कभी अपने हृदय में
मैं तुम्हारे साथ ही थी हर घड़ी,हर श्वाँस-लय में
किन्तु तुम ही व्यस्त थे प्रिय ! व्यर्थ के धन-संचयन में
मैं सदा सहभागिनी थी हर पराजय ,जय-विजय में
मन भटकता रह गया तो मन का फिर उद्धार क्या है ?
यह तुम्हारा प्रणय-हठ है ,एक तरफा प्यार क्या है !

-आनन्द.पाठक

शनिवार, 30 जुलाई 2011

एक गीत : क्यों किरण किरण तेज़ाब हुई .....

क्यों किरण किरण तेज़ाब हुई औ’ हवा हुई जहरीली है ?

श्वाँस श्वाँस बारूद भरे हैं ,आँख आँख के सूखे पानी
हाथ-हथेली रक्त सने हैं , पनघट पनघट पे वीरानी
क्यों राजघाट को जाने वाली राह हुई पथरीली है ?
क्यों किरण किरण........

दीपक दीपक नज़रबन्द हैं , अँधियारों की खुली चुनौती
गुलशन गुलशन कलियाँ सहमी ,माली करता माँग फ़िरौती
क्यों गंगा-जमुना के आँगन में मलिन हुई रंगोली है ?
क्यों किरण किरण .....
मेहदी रची हुई हथेली , श्रृंगार महावर पावों में
क्यों धुलता सिन्दूर कोई आतंकी शहरों ,गावों में ?
गौतम-गाँधी की धरती पर यह ख़ून सनी क्यों होली है ?
क्यों किरण किरण.....
जब भी उगा ,उगा पूरब से , सूरज के फैले उजियारे
विश्व शान्ति के श्वेत कबूतर !क्षत-विक्षत क्यों पंख तुम्हारे ?
मन्दिर-मस्जिद जाने वालों ! क्यों कड़वी तीखी बोली है ?
क्यों किरण किरण तेज़ाब हुई औ’ हवा हुई जहरीली है ?

-आनन्द

रविवार, 24 जुलाई 2011

एक ग़ज़ल 24 : जब से उन की आत्मा है मर गई ...

बह्र-ए-रमल मुसद्द्स महज़ूफ़
फ़ाइलातुन---फ़ाइलातुन-फ़ाइलुन
2122--2122---212
------------------------------
एक ग़ज़ल : जब से उनकी आत्मा है मर गई......

जब से उनकी आत्मा है मर गई
उनके घर उनकी तिजोरी भर गई

चन्द रोटी से जुड़ी मजबूरियाँ
रात ’कोठी" वो गई अक्सर गई

जब गई थाने ’रपट’ करने कभी
फिर न "छमिया" बाद अपने घर गई

फूल ,कलियाँ,तितलियाँ सहमी सभी
जब से माली की नज़र उन पर गई

लाश पर वो रोटियाँ सेंका किए
आदमी की आदमीयत मर गई

हादसे में मरने वाले मर गए
देख-सुन सरकार अपने घर गई

-आनन्द पाठक--

[सं 02-06-18]

मंगलवार, 5 जुलाई 2011

एक ग़ज़ल 23 : आते नहीं हैं मुझ को.....

बह्र-ए-मुज़ारि’अ मुसम्मन अख़रब
मफ़ऊलु--फ़ाइलातुन // मफ़ऊलु-- फ़ाइलातुन
221---2122--// 221----2122
-----------------------------------------

ग़ज़ल : आते नहीं हैं मुझ को.....



आते नहीं हैं मुझ को ,ये राज़-ए-दिल छुपाने

इज़हार-ए-आशिक़ी के, ढूंढे हैं सौ बहाने



क्या क्या न था सुनाना ,क्या क्या लगे सुनाने

जब सामने वो आए. होश आ गए ठिकाने



नाज़-ओ-ग़रूर इतना , गर हुस्न पे है तुझको

मुझको भी इश्क़ का इक, तुहफ़ा दिया ख़ुदा ने



कुछ तो ज़रूर होगा , इस मैक़दे में , ज़ाहिद !

जो तू भी आ गया है , यां पर किसी बहाने



कहने में आ गये हैं  ,वो दुश्मनों की शायद

लो आ गए वो, देखो !, फिर से हमें सताने



क्या क्या सफ़ाई देता , जा कर तेरी गली में

मैं ख़ुद-गरज़ नहीं था , तू माने या न माने



हर्फ़-ए-वफ़ा से वाक़िफ़ ,जो आज तक नही हैं

महफ़िल में आ गए हैं ,मानी हमें बताने



राह-ए-तलाश-ए-हक़ में इक उम्र कटी "आनन"

इक आग सी लगा दी ,किस ग़ैब की निदा ने ?


---आनन्द पाठक-
[सं 02-06-18]

सोमवार, 4 अप्रैल 2011

एक गीत : जब आकर मिलना ही नहीं है.....

एक गीत : जब आकर मिलना ही नहीं है.....

जब आकर मिलना ही नहीं है ,फिर सपनों में आती क्यों हो ?

अवचेतन मन के कोने में ,कहीं एक आभासी छाया
मन प्यासा रह गया अधूरा, क्यों संतॄप्त नहीं हो पाया ?

जब मन को प्यासा रखना है बदली बन घिर आती क्यों हो?
रह रह प्यास जगाती क्यों हो?

’भूल तुम्हें मैं जाऊँगा’-धत, तुमने कैसे मान लिया है ?
मेरे प्रणय-निवेदन का ही तुमने कब संज्ञान लिया है ?

’ना’ से ’हाँ’ तक आते-आते ,अकस्मात रुक जाती क्यों हो?
फिर हँस कर हट जाती क्यों हो?

’राधा’ की तो बात अलग है ,’मीरा’ की मीरा ही जाने
’नल-दमयन्ती’ कथा कहानी क्यों लगती हो मुझे सुनाने ?

जो मुझको स्वीकार नहीं है बात वही दुहराती क्यों हो ?
मन की बात छुपाती क्यों हो?

मैं ही नहीं अकेला, सुमुखी ! इस नगरी का प्रथम प्रवासी
मुझ से पहले रहे हज़ारों ,समझ इसे ही का’बा काशी

तुम को सब मालूम अगर है ,फिर मुझको भटकाती क्यों हो ?
फिर यह प्रीति बढ़ाती क्यों हो ?

काल-चक्र के अन्तराल में ,सब मिट जाना ,फिर क्यों ऐंठे ?
आँखें सदा प्रतीक्षारत हैं ,हम आने के क्रम में बैठे

रह रह कर फिर समय द्वार का सांकल ,प्रिये ! बजाती क्यों हो?
फिर मुझ से छुप जाती क्यों हो?

आँख-मिचौली करते करते बीत गई जब सारी उमरिया
थके श्वाँस मन प्राण शिथिल हैं अब क्यों आई पास गुजरिया ?

लो, ख़ुद को कर दिया समर्पित ,प्रिये! इसे ठुकराती क्यों हो ?
दोष-प्रदोष पे जाती क्यों हो ?
जब आकर मिलना ही नहीं है ,फिर सपनों में आती क्यों हो ?

-आनन्द

मंगलवार, 29 मार्च 2011

गीत : तुम ने ज्योति जलाई होगी ......

तुम ने ज्योति जलाई होगी , याद मेरी भी आई होगी

तुम ने भी तो देखा होगा, तारों को स्पन्दन करते
स्निग्ध चाँदनी की किरणों को, लहरों का आलिंगन करते

फिर तुम से रह गया न होगा ,मन ही मन शरमाई होगी
याद मेरी भी .......

प्रथम किरण के स्वागत में जब हम दोनों ने अर्ध्य चढ़ाए
ऐसा ग्रहण लगा जीवन में ,तब से अब तक उबर न पाए

मुझको सम्बल देते देते ख़ुद की पीर भुलाई होगी
याद मेरी भी.....

याद तुम्हें भी आती होगी मिट्टी को वो बने घरौंदे
निष्ठुर काल-चक्र के पाँवो तले गए थे कैसे रौंदे !

मैने तो सच मान लिया था ,तुम सच मान न पायी होगी
याद मेरी भी ....

मृत्यु मिलन है ,जन्म विरह है ,क्यों हो हर्षित ?क्यों हों दुखी ?
कभी सृजन है कभी प्रभंजन ,यह तो जीवन-क्रम , सुमुखी !

रेत पटल पर नाम मेरा लिख कितनी क़समें खाई होगी
तुम ने ज्योति जलाई होगी, याद मेरी भी आई होगी

-आनन्द

रविवार, 27 मार्च 2011

एक ग़ज़ल 22 : मुहब्बत की जादू बयानी......

फ़ऊलुन---फ़ऊलुन--फ़ऊलुन--फ़ऊलुन
122----------122------122--------122
बह्र-ए-मुतक़रिब मुसम्मन सालिम
---------------------------------------------

ग़ज़ल

मुहब्बत की जादू-बयानी न होती
अगर तेरी मेरी कहानी न होती

न "राधा" से पहले कोई नाम आता
अगर कोई ’मीरा" दिवानी न होती

ये राज़-ए-मुहब्बत न होता नुमायां
जो बहकी हमारी जवानी न होती

हमें दीन-ओ-ईमां से क्या लेना-देना
बला जो अगर आसमानी न होती

उमीदों से आगे उमीदें न गर हो
तो हर साँस में ज़िन्दगानी न होती

कोई बात तो उन के दिल पे लगी है
ख़ुदाया ! मेरी लन्तरानी न होती

रकीबों की बातों में आता न गर वो
तो ’आनन’ उसे बदगुमानी न होती

-आनन्द.पाठक

नुमायां = ज़ाहिर होना
लन्तरानी = झूटी शेखी /डींग मारना
[सं 20-05-18]

शनिवार, 8 जनवरी 2011

एक गीत : जब देहरी को ....

गीत : जब देहरी को ....

जब देहरी को ठुकरा कर ही जाना है
फिर बोलो वन्दनवार सजा कर क्या होगा ?

आँखों के नेह निमन्त्रण की प्रत्याशा में
पावन आँचल के छाँवों की अभिलाषा में
हर बार गईं ठुकराई मेरी मनुहारें-
हर बार ज़िन्दगी कटी शर्त की भाषा में

जब अँधियारों की ही केवल सुनवाई हो
फिर वहाँ रोशनी की बातें कर क्या होगा ?

तुम निष्ठुर हो ,तुम प्रणय समर्पण क्या जानो !
दो अधरों की चिर-प्यास भला तुम क्या जानो !
क्यों मेरा पूजन-अर्चन तुमको आडम्बर ?
हर पत्थर में देवत्व छुपा तुम क्या जानो !

जब पूजा के थाल छोड़ उठ जाना ,प्रियतम !
फिर अक्षत-चन्दन ,दीप जला कर क्या होगा ?

मेरी गीता के श्लोक तुम्हें क्यों व्यर्थ लगे ?
मेरे गीतों के दर्द तुम्हें असमर्थ लगे
जीवन-वेदी मिट्टी की बनी है मेरी
क्यों तुमको ठोकर लगे ,तुम्हें अभिशप्त लगे?

जब हवन-कुण्ड की ज्योति जली बुझ जानी है
फिर ऋचा मन्त्र से आवाहन कर क्या होगा !
जब देहरी को ठुकरा कर .............

-आनन्द