शनिवार, 8 जनवरी 2011

एक गीत : जब देहरी को ....

गीत : जब देहरी को ....

जब देहरी को ठुकरा कर ही जाना है
फिर बोलो वन्दनवार सजा कर क्या होगा ?

आँखों के नेह निमन्त्रण की प्रत्याशा में
पावन आँचल के छाँवों की अभिलाषा में
हर बार गईं ठुकराई मेरी मनुहारें-
हर बार ज़िन्दगी कटी शर्त की भाषा में

जब अँधियारों की ही केवल सुनवाई हो
फिर वहाँ रोशनी की बातें कर क्या होगा ?

तुम निष्ठुर हो ,तुम प्रणय समर्पण क्या जानो !
दो अधरों की चिर-प्यास भला तुम क्या जानो !
क्यों मेरा पूजन-अर्चन तुमको आडम्बर ?
हर पत्थर में देवत्व छुपा तुम क्या जानो !

जब पूजा के थाल छोड़ उठ जाना ,प्रियतम !
फिर अक्षत-चन्दन ,दीप जला कर क्या होगा ?

मेरी गीता के श्लोक तुम्हें क्यों व्यर्थ लगे ?
मेरे गीतों के दर्द तुम्हें असमर्थ लगे
जीवन-वेदी मिट्टी की बनी है मेरी
क्यों तुमको ठोकर लगे ,तुम्हें अभिशप्त लगे?

जब हवन-कुण्ड की ज्योति जली बुझ जानी है
फिर ऋचा मन्त्र से आवाहन कर क्या होगा !
जब देहरी को ठुकरा कर .............

-आनन्द