शनिवार, 30 जुलाई 2011

एक गीत : क्यों किरण किरण तेज़ाब हुई .....

क्यों किरण किरण तेज़ाब हुई औ’ हवा हुई जहरीली है ?

श्वाँस श्वाँस बारूद भरे हैं ,आँख आँख के सूखे पानी
हाथ-हथेली रक्त सने हैं , पनघट पनघट पे वीरानी
क्यों राजघाट को जाने वाली राह हुई पथरीली है ?
क्यों किरण किरण........

दीपक दीपक नज़रबन्द हैं , अँधियारों की खुली चुनौती
गुलशन गुलशन कलियाँ सहमी ,माली करता माँग फ़िरौती
क्यों गंगा-जमुना के आँगन में मलिन हुई रंगोली है ?
क्यों किरण किरण .....
मेहदी रची हुई हथेली , श्रृंगार महावर पावों में
क्यों धुलता सिन्दूर कोई आतंकी शहरों ,गावों में ?
गौतम-गाँधी की धरती पर यह ख़ून सनी क्यों होली है ?
क्यों किरण किरण.....
जब भी उगा ,उगा पूरब से , सूरज के फैले उजियारे
विश्व शान्ति के श्वेत कबूतर !क्षत-विक्षत क्यों पंख तुम्हारे ?
मन्दिर-मस्जिद जाने वालों ! क्यों कड़वी तीखी बोली है ?
क्यों किरण किरण तेज़ाब हुई औ’ हवा हुई जहरीली है ?

-आनन्द

रविवार, 24 जुलाई 2011

एक ग़ज़ल 24 : जब से उन की आत्मा है मर गई ...

बह्र-ए-रमल मुसद्द्स महज़ूफ़
फ़ाइलातुन---फ़ाइलातुन-फ़ाइलुन
2122--2122---212
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एक ग़ज़ल : जब से उनकी आत्मा है मर गई......

जब से उनकी आत्मा है मर गई
उनके घर उनकी तिजोरी भर गई

चन्द रोटी से जुड़ी मजबूरियाँ
रात ’कोठी" वो गई अक्सर गई

जब गई थाने ’रपट’ करने कभी
फिर न "छमिया" बाद अपने घर गई

फूल ,कलियाँ,तितलियाँ सहमी सभी
जब से माली की नज़र उन पर गई

लाश पर वो रोटियाँ सेंका किए
आदमी की आदमीयत मर गई

हादसे में मरने वाले मर गए
देख-सुन सरकार अपने घर गई

-आनन्द पाठक--

[सं 02-06-18]

मंगलवार, 5 जुलाई 2011

एक ग़ज़ल 23 : आते नहीं हैं मुझ को.....

बह्र-ए-मुज़ारि’अ मुसम्मन अख़रब
मफ़ऊलु--फ़ाइलातुन // मफ़ऊलु-- फ़ाइलातुन
221---2122--// 221----2122
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ग़ज़ल : आते नहीं हैं मुझ को.....



आते नहीं हैं मुझ को ,ये राज़-ए-दिल छुपाने

इज़हार-ए-आशिक़ी के, ढूंढे हैं सौ बहाने



क्या क्या न था सुनाना ,क्या क्या लगे सुनाने

जब सामने वो आए. होश आ गए ठिकाने



नाज़-ओ-ग़रूर इतना , गर हुस्न पे है तुझको

मुझको भी इश्क़ का इक, तुहफ़ा दिया ख़ुदा ने



कुछ तो ज़रूर होगा , इस मैक़दे में , ज़ाहिद !

जो तू भी आ गया है , यां पर किसी बहाने



कहने में आ गये हैं  ,वो दुश्मनों की शायद

लो आ गए वो, देखो !, फिर से हमें सताने



क्या क्या सफ़ाई देता , जा कर तेरी गली में

मैं ख़ुद-गरज़ नहीं था , तू माने या न माने



हर्फ़-ए-वफ़ा से वाक़िफ़ ,जो आज तक नही हैं

महफ़िल में आ गए हैं ,मानी हमें बताने



राह-ए-तलाश-ए-हक़ में इक उम्र कटी "आनन"

इक आग सी लगा दी ,किस ग़ैब की निदा ने ?


---आनन्द पाठक-
[सं 02-06-18]