मंगलवार, 5 जुलाई 2011

ग़ज़ल : आते नहीं हैं मुझ को.....

ग़ज़ल : आते नहीं हैं मुझ को.....



आते नहीं हैं मुझ को ये राज़-ए-दिल छुपाने

इज़हार-ए-आशिक़ी के ढूंढे हैं सौ बहाने



क्या था उन्हें सुनाना ,क्या क्या लगे सुनाने

जब रू-ब-रू हुए तो होश आ गए ठिकाने



नाज़-ओ-ग़रूर इतना गर हुस्न पे है तुझको

मुझको भी इश्क़ का इक तुहफ़ा दिया ख़ुदा ने



कुछ तो ज़रूर होगा इस मैक़दे में , ज़ाहिद !

जो तू भी आ गया है यां पर किसी बहाने



कहने में आ गये हैं वो दुश्मनों की शायद

लो आ गए वो, देखो ! फिर से हमें सताने



क्या क्या सफ़ाई देता जा कर तेरी गली में

मैं ख़ुद-गरज़ नहीं था तू माने या न माने



हर्फ़-ए-वफ़ा से वाक़िफ़ जो आज तक नही हैं

महफ़िल में आ गए हैं मानी हमें बताने



राह-ए-तलाश-ए-हक़ में इक उम्र कटी "आनन"

इक आग सी लगा दी किस ग़ैब की निदा ने ?


---आनन्द

2 टिप्‍पणियां:

Sunil Kumar ने कहा…

बहुत खुबसूरत ग़ज़ल मुबारक हो...

शारदा अरोरा ने कहा…

vaah vaah , behad khoobsoorat gazal ...padh kar daad dene ko jee chahe ...