मंगलवार, 5 जुलाई 2011

एक ग़ज़ल 23 : आते नहीं हैं मुझ को.....

बह्र-ए-मुज़ारि’अ मुसम्मन अख़रब
मफ़ऊलु--फ़ाइलातुन // मफ़ऊलु-- फ़ाइलातुन
221---2122--// 221----2122
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ग़ज़ल : आते नहीं हैं मुझ को.....



आते नहीं हैं मुझ को ,ये राज़-ए-दिल छुपाने

इज़हार-ए-आशिक़ी के, ढूंढे हैं सौ बहाने



क्या क्या न था सुनाना ,क्या क्या लगे सुनाने

जब सामने वो आए. होश आ गए ठिकाने



नाज़-ओ-ग़रूर इतना , गर हुस्न पे है तुझको

मुझको भी इश्क़ का इक, तुहफ़ा दिया ख़ुदा ने



कुछ तो ज़रूर होगा , इस मैक़दे में , ज़ाहिद !

जो तू भी आ गया है , यां पर किसी बहाने



कहने में आ गये हैं  ,वो दुश्मनों की शायद

लो आ गए वो, देखो !, फिर से हमें सताने



क्या क्या सफ़ाई देता , जा कर तेरी गली में

मैं ख़ुद-गरज़ नहीं था , तू माने या न माने



हर्फ़-ए-वफ़ा से वाक़िफ़ ,जो आज तक नही हैं

महफ़िल में आ गए हैं ,मानी हमें बताने



राह-ए-तलाश-ए-हक़ में इक उम्र कटी "आनन"

इक आग सी लगा दी ,किस ग़ैब की निदा ने ?


---आनन्द पाठक-
[सं 02-06-18]

2 टिप्‍पणियां:

Sunil Kumar ने कहा…

बहुत खुबसूरत ग़ज़ल मुबारक हो...

शारदा अरोरा ने कहा…

vaah vaah , behad khoobsoorat gazal ...padh kar daad dene ko jee chahe ...