शनिवार, 5 नवंबर 2011

एक गीत : मैं वो गीत नहीं गाता हूं......

शब्दों की नक़्क़ाशी केवल, भाव गीत के अलग-थलग हों
दिल से दिल की राह न निकले मैं वो गीत नहीं गाता हूँ

दिल में तो दीवार खड़ी है चेहरे पर मुस्कान दिखाते
हानि-लाभ की गणना कर के फिर कोई एहसान जताते
गली काठ की हांडी में है कितनी बार पकाए खिचड़ी
दीन-धरम के बातें करते नगर नगर शमशान बनाते

मन्दिर-मस्जिद वाली राहें हो जितनी भी पाक मुक़्क़्दस
नफ़रत की गलियों से गुज़रे ,मैं उस राह नहीं जाता हूँ

झूठ गवाही देता फिरता राज भवन के गलियारे में
सत्य सफाई देते देते तोड़ दिया दम उँजियारे में
कदाचार की महिमा मण्डित करने वाले मिले हज़ारों
सदाचार की गरिमा हमने छोड़ दिया ख़ुद अँधियारे में

मिथ्या आडम्बर के मेले झूठा करता नंगा नर्तन -
चाहे जितनी बजे तालियाँ ,खुद को सहज नहीं पाता हूँ

’वोट-बैंक’ की राजनीति में "बुधना" इक सामान हो गया
जब चाहे तब मोल लगा लो कितना यह आसान हो गया
तपे-तपाये लोग यहाँ भी सत्ता-कुर्सी की माया में -
निष्ठा ऐसे बदलें जैसे अन्दर का परिधान हो गया

आदर्शों के थोथे नारे आँखों में घड़ियाली आँसू
मैं फेंके सिक्कों की ख़ातिर चारण-गीत नहीं गाता हूँ
मैं वो गीत नहीं गाता हूँ..............................

आनन्द.पाठक