गुरुवार, 15 दिसंबर 2011

एक ग़ज़ल : चुनावों के मौसम जो आने लगे---

एक चुनावी ग़ज़ल

चुनावों के मौसम जो आने लगे हैं
’सुदामा’ के घर ’कृश्न’ जाने लगे हैं

जिन्हें पाँच वर्षों से देखा नहीं है
वही ख़ुद को ख़ादिम बताने लगे हैं

हुई जिनकी ’टोपी’ है मैली-कुचैली
मुझे सच की मानी सिखाने लगे हैं

ख़ुदा जाने होता यकीं क्यों नहीं है !
नये ख़्वाब फ़िर से दिखाने लगे हैं

मेरी झोपड़ी पे तरस खाने वालों
बनाने में इसको ज़माने लगे हैं

हमें उनकी नीयत पे शक तो नहीं है
वो नज़रें मगर क्यों चुराने लगे हैं?

चलो मान लेते हैं बातें तुम्हारी
निवाले मिरे कौन खाने लगे हैं?

कहाँ जाके मिलते हम ’आनन’किसी से
यहाँ सब मुखौटे चढ़ाने लगे हैं


-आनन्द.पाठक
[नोट कृश्न = कृष्ण]

3 टिप्‍पणियां:

शारदा अरोरा ने कहा…

vaah , bahut badhiya ...

शारदा अरोरा ने कहा…

हमें उनकी नीयत पे शक तो नहीं है
वो नज़रें मगर क्यों चुराने लगे हैं?
yahan jara virodhabhaas hai ...kyonki poori gazl to ye cheekh cheekh kar kah rahi hai ki hame un par bharosa nahi hai ...iski jagah agar likhte ki
हमें उनकी नीयत पे शक तो नहीं है
isiliye kya वो नज़रें चुराने लगे हैं?

आनन्द पाठक ने कहा…

आ0 शारदा जी
टिप्पणी के लिए धन्यवाद
"इस लिए क्या " कहने से ग़ज़ल बह्र से ख़ारिज़ हो जायेगी .
"वो नज़रें मगर क्यों चुराने लगे हैं" मे जो सवाल है वो जवाब तो आप ने दे ही दिया "इसी लिए....’ वो नज़रें...

सादर
आनन्द.पाठक