शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2012

एक गीत : मन का द्वार नहीं खुल पाया...


कर लो जितना पूजन-अर्चन ,चाहे जितना पुष्प समर्पण

मन का द्वार नहीं खुल पाया फिर क्या मथुरा,काबा,काशी



कहने को तो अन्धकार में ,वह प्रकाश की ज्योति जगाते

अरबों के आश्रम है जिनके ख़ुद को निर्विकार बतलाते

जिस दुनिया से भाग गए थे लौट उसी दुनिया में आए

भक्तों की गठरी से अपनी गठरी का हैं वज़न बढ़ाते


मठाधीश बन कर बैठे हैं मार कुण्डली दान-पात्र पर

क्या अन्तर फिर रह जाता है हो भोगी या हो सन्यासी



सबके अपने अपने दर्शन सबकी अपनी चमक-दमक है

सबकी राहें एक दिशा की फिर भी राहें अलग-अलग हैं

क्षमा दया करुणा सब में है फिर काहे की मारा-मारी

’शबरी’ की कुटिया सूनी है हर आश्रम से अलग-थलग है


आँख मूंद कर प्रवचन करते ,अन्तर्नेत्र नहीं खुल पाया

मन प्यासा रह गया अगर तो फिर क्या तीरथ बारहमासी



छोड़ ’तपोवन’ आ पहुँचे है सत्ता के गलियारों में अब

भागीदारी खोज रहे हैं ’दिल्ली’ के दरबारों में अब

मेरे लिए तो सिंहासन है तेरे लिए ’चटाई ’ .बन्दे !

"दान-पुण्य’ कर मूढ़मते !कुछ जो तेरे अधिकारों में अब


वह भी कितने मायारत हैं आजीवन जो रहे सिखाते

" जनम-मरण इक शाश्वत क्रम है ईश्वर अंश जीव अविनाशी"



आनन्द.पाठक

1 टिप्पणी:

शारदा अरोरा ने कहा…

sach se aagaah karte hue ...badhiya .