शुक्रवार, 24 फ़रवरी 2012

एक गीत : किस युग की बातें करते हो ?


दीन धरम औ’ सच की बातें ? किस युग की बातें करते हो?

’सतयुग’ बीते सदियाँ गुजरी तुम जिसकी बातें करते हो .



मैंने तो निश्छल समझा था भेंज दिया संसद में चुन के

मुझको क्या मालूम कि तुम भी बह जाओगे जैसे तिनके

सच पर ’ग्रहण’ लगाने वाले ’राहू-केतू ’मयख़ाने में

’उग्रह’ कभी न होने देंगे जब तक सत्ता वश में उनके

बेंच दिया जब ख़ुद को तुमने ’सूटकेस’ औ’ थैली पर ही

आदर्शों के अवमूल्यन की फिर तुम क्यों बातें करते हो ?



जो हाथ मिलाने वाले हैं कुर्सी से हाथ मिलाते हैं

जितने की ज़रूरत होती है उतना ही साथ निभाते हैं

रिश्तों की महक वो क्या जानें जो ’कम्प्युटर’ पर आयातित

’इ-मित्रों’ की संख्या गिनते हैं फिर अपनी साख बताते हैं

रिश्तों को तौल दिया तुमने जब ’हानि-लाभ’ के पलड़ों पर

अपनों के बेगानेपन पे फिर तुम क्यों आहें भरते हो ?



बात जहाँ पे तय होनी थी कलम बड़ी तलवारों से

’स्वतन्त्रता की अभिव्यक्ति’ पर उछ्ल रहे थें जयकारो से

जो सरकारी अनुदानों पर पले हुए सुविधा रोगी थे

समर शुरू होने से पहले खिसक लिए पिछली द्वारों से

जब अपने पर आन पड़ी तो ’अगर-मगर’ कर बगल झांकते

फिर क्यों अपनी पौरुषता की यूँ ऊँची बातें करते हो ?



-आनन्द.पाठक

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