बुधवार, 29 फ़रवरी 2012

एक गीत : मुझसे मेरे गीतों का ....



मुझसे मेरे गीतों का ,प्रिय ! अर्थ न पूछो

कहाँ कहाँ से हमें मिलें हैं, दर्द न पूछो



जब भी मेरे दर्दों को विस्तार मिला है

तब जाकर इन गीतों को आकार मिला है

जब शब्दों को अपनी आहों में ढाला हूँ

तब जाकर इन गीतों को आवाज़ मिला है


जीवन की अधलिखी किताबों के पन्नों पर

किसने लिखे हैं पीड़ा के ये सर्ग ,न पूछो !



स्वप्नों में कुछ रूप तुम्हारा मैं गढ़ता हूँ

एक मिलन की आस लिए आगे बढ़ता हूँ

दुनिया ने कब मेरे सच को सच माना है?

अपनी राम कहानी मैं ख़ुद ही पढ़ता हूँ


जिन गीतों को सुन कर आंसू ढुलक गए हों

उन गीतों के क्या क्या थे सन्दर्भ , न पूछो



करनी थी दो बातें तुमसे ,कर न सके थे

उभरे थे सौ बार अधर पे ,कह न सके थे

कुछ तेरी रुस्वाई का डर ,कुछ अपना भी

छलके थे दो बूँद नयन में ,बह न सके थे


तुम कभी इधर आना तो ख़ुद ही पढ़ लेना

पथराई आंखों के क्या थे शर्त , न पूछो

मुझसे मेरे गीतों का .....



-आनन्द.पाठक

4 टिप्‍पणियां:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

वाह!
बहुत उम्दा प्रस्तुति!

Sunil Kumar ने कहा…

दर्द ही गीत होते हैं सुंदर अतिसुन्दर , बधाई

वाणी गीत ने कहा…

मुझसे गीतों के अर्थ ना पूछो !!
सुन्दर !

दिलबाग विर्क ने कहा…

आपकी पोस्ट चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है
कृपया पधारें
http://charchamanch.blogspot.com
चर्चा मंच-805:चर्चाकार-दिलबाग विर्क>