शुक्रवार, 30 मार्च 2012

गीत 41 : आना जितना आसान रहा.....


आना जितना आसान रहा

क्या जाना भी आसान ?प्रिये ! कुछ बात मेरी भी मान प्रिये !



तुम प्रकृति नटी से लगती हो इन बासन्ती परिधानों में

तेरे गायन के सुर पंचम घुल जाते कोयल तानों में

जितना सुन्दर ’उपमेय’ रहा ,क्या उतना ही ’उपमान’? प्रिये !

या व्यर्थ मिरा अनुमान ,प्रिये !



जब मन की आँखें चार हुई तन चन्दनवन सा महक उठा

अन्तस में ऐसी प्यास जगी आँखों मे आंसू छलक उठा

तुम जितने भी अव्यक्त रहे क्या उतने ही अनजान ?प्रिये !

फिर क्या होगी पहचान ? प्रिये !



कद से अपनी छाया लम्बी क्यों उसको ही सच मान लिया

अपने से आगे स्वयं रहे कब औरों का सम्मान किया

जितना ही सुखद उत्थान रहा क्या उतना ही अवसान ? प्रिये !

फिर काहे का अभिमान ?प्रिये !



यूँ कौन बुलाता रहता है जब खोया रहता हूँ भ्रम में

मन धीरे धीरे रम जाता जीवन के क्रम औ’अनुक्रम में

मन का बँधना आसान यहाँ ,पर खुलना कब आसान ,प्रिये !

क्या व्यर्थ रहा सब ज्ञान ,प्रिये !

आना जितना आसान रहा

क्या जाना भी आसान ?प्रिये ! कुछ बात मेरी भी मान प्रिये !



आनन्द.पाठक

शुक्रवार, 23 मार्च 2012

गीत 40 : ना मैं जोगी ,ना मैं....




ना मैं जोगी ,ना मैं ज्ञानी, मैं कबिरा की सीधी बानी ।



वेद पुरान में क्या लिख्खा है ,मैं अनपढ हूं ,मैं क्या जानू

दिल से दिल की राह मिलेगी मन निच्छल हो,मैं तो मानू

ये ऊँचा है, वो नीचा है , ये काला है , वो गोरा है

आंसू हो या रक्त किसी का ,एक रंग ही मैं पहचानू


जल की मछली जल में प्यासी किसने है ये रीत बनाई

ज्ञानी-ध्यानी सोच रहे हैं ’जल में नलिनी क्यों कुम्हलानी"?



मन के अन्दर ज्योति छुपी है ,क्यों न जगाता उस को बन्दे !

तुमने ही तो फेंक रखे हैं , अपने ऊपर इतने फन्दे

मन की बात सुना कर प्यारे ! अपनी सोच न गिरवी रख दे

आश्रम की तो बात अलग है , आश्रम के हैं अपने धन्धे


जिस कीचड़ में लोट रहा है ,उस कीचड़ का अन्त नहीं है

दास कबिरा कह गए साधो ," माया महा ठगिन हम जानी"



पोथी पतरा पढ़-पढ़ हारा ,जो पढ़ना था पढ न सके हम

आते-जाते जनम गँवाया ,जो करना था कर न सके हम

मन्दिर-मस्जिद-गिरिजा झांके ,मन के अन्दर कब झांका हैं?

ख़ुद से ख़ुद की बातें करनी थी आजीवन कर न सके हम


सबकी अपनी परिभाषा है अपने अपने अर्थ लगाते

कहत कबीरा उलट बयानी " बरसै कम्बल भींजै पानी"

ना मैं जोगी ,ना मैं......................................


आनन्द.पाठक







शुक्रवार, 9 मार्च 2012

गीत 38 :काहे नS रंगवा लगउलु हो गोरिया


काहे नS रंगवा लगउलु हो गोरिया ...काहे नS रंगवा लगउलु ?



अपने नS अईलु न हमके बोलऊलु ,’कजरी’ के हाथे नS चिठिया पठऊलु

होली में मनवा जोहत रहS गईलस. केकरा से जा के तू रंगवा लगऊलु

रंगवा लगऊलु......तू रंगवा लगऊलु...

काहे केS मुँहवा फुलऊलु संवरिया ? काहे केS मुँहवा बनऊलु ?



रामS के संग होली सीता जी खेललीं ,’राधा जी खेललीं तS कृश्ना से खेललीं

होली के मस्ती में डूबलैं सब मनई नS अईलु तS तोहरे फ़ोटुए से खेललीं

फोटुए से खेललीं... हो फ़ोटुए से खेललीं....

अरे ! केकराS से चुनरी रंगऊलु ?, सँवरिया ! केकरा से चुनरी रंगऊलु ?



’रमनथवा’ खेललस ’रमरतिया’ के संगे, ’मनतोरनी ’ खेललस संघतिया के संगे

दुनिया नS कहलस कछु होली के दिनवा ,खेललस ’जमुनवा’ ’सुरसतिया’ के संगे

सुरसतिया के संगे.....सुर सतिया के संगे....

केकरा केS डर से तू बाहर नS अईलु ,नS अंगवा से अंगवा लगउलु

काहें गोड़धरिया करऊलु संवरिया.....



काहें गोड़धरिया करऊलु.?..............काहें न रंगवा लगऊलु ?



-आनन्द.पाठक