शुक्रवार, 16 मार्च 2012

एक गीत : तुम चाहे जितने पहरेदार...


तुम चाहे जितना पहरेदार बिठा दो

दो नयन मिले तो भाव एक रहते हैं


दो दिल ने कब माना है जग का बन्धन

नव सपनों का करता रहता आलिंगन

जब युगल कल्पना मूर्त रूप लेती है

मन ऐसे महका करते जैसे चन्दन


दो उच्छवासों में एक प्राण घुल जाएं

तब मन के अन्तर्भाव एक रहते हैं



यह प्रणय स्वयं में संस्कृति है ,इक दर्शन

यह चीज़ नहीं कि करते रहें प्रदर्शन

अनुभूति और एहसास तले पलता है

यह ’तन’ का नहीं है,"मन’ का है आकर्षण


जब मर्यादा की लक्ष्मण-रेखा आती

दो कदम ठिठक ,ठहराव एक रहते हैं



उड़ते बादल पे चित्र बनाते कल के

जब बिखर गए तो फिर क्यों आँसू ढुलके

जब यथार्थ की दुनिया से टकराए

जो रंग भरे थे उतर गए सब धुल के


नि:शब्द और बेबस आँखें कहती हैं

दो हृदय टूटते घाव एक रहते हैं

तुम चाहे जितने पहरेदार बिठा दो, दो नयन मिले तो भाव एक रहते हैं






3 टिप्‍पणियां:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति!
इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
सूचनार्थ!

रश्मि ने कहा…

वाह....;क्‍या बात है

रश्मि ने कहा…

वाह....;क्‍या बात है