रविवार, 15 अप्रैल 2012

एक ग़ज़ल : पागलों सी बात करता है...


पागलों सी बात करता है

सत्य वो सरेआम कहता है



गालियाँ ही आज तक पाई

जब भी पर्दाफ़ाश करता है



वो अजायब घर का शै होगा

ग़ैर का जो दर्द सहता है



चाह कर भी कह नहीं पाता

जब भी अपनी बात कहता है



जब अदालत में सभी बहरे

किस से वो फ़रियाद करता है ?



अलगरज़ कुछ तो सबब होगा

कौन किस पर यूँ ही मरता है?



सूलियों पर क्यों टँगा ’आनन’?

आदमी से प्यार करता है



आनन्द.पाठक
09413395592