मंगलवार, 8 मई 2012

एक ग़ज़ल : सोचता हूं......





सोचता हूँ इस शहर में आदमी रहता किधर है ?

बस मुखौटे ही मुखौटे जिस तरफ़ जाती नज़र है



दिल की धड़कन मर गई है अब मशीनी धड़कनों में

आंख में पानी नहीं, बस बच गया तीखा ज़हर है



ज़िन्दगी तो कट गई फुट्पाथ से फुटपाथ ,यारो !

ख़्वाब सब गिरवी रखे हैं ,कर्ज़ पर जीवन बसर है



हर ख़ुशी नीलाम कुछ मज़बूरियों के नाम पर है

तीरगी हो, रोशनी हो , सब बराबर बेअसर है



एक मुट्टी आस्मां वो भी किराये पर मिला है

कब्र की दो गज़ ज़मीं से साँस कितनी बेख़बर है !



प्यार के दो पल की ख़्वाहिश ,आँख में सपने हज़ारों

हासिल-ए-हस्ती यही है ,दिल हमारा दर-ब-दर है



लौट कर वापस परिन्दे आयेंगे इस डाल पर भी

बस इसी उम्मीद में ही आज भी ज़िन्दा शज़र है



बरसरे बाज़ार यूं क्या क्या नहीं बिकता है ’आनन’

आदमी का मोल ही कमतर रहा बस हर दहर है



-आनन्द पाठक
09413395592



[बरसरे बाज़ार = भरे बाज़ार में

दहर = काल /समय/ युग