शुक्रवार, 1 जून 2012

एक ग़ज़ल : लोग अपनी ही सुनाने में.....




लोग अपनी ही सुनाने में लगे हैं

एक हम हैं ग़म भुलाने में लगे हैं



जख़्म मेरे उनको लगते बेसबब हैं

वो ख़राश-ए-कफ़ दिखाने में लगे हैं



क्या हक़ीक़त आप की है ?जानता हूँ

कौन सा चेहरा चढ़ाने में लगे हैं ?



आप तो सच के धुले लगते नहीं हैं

फिर बहाने क्यों बनाने में लगे हैं ?



जो जगे हैं लोग तो चलते नहीं हैं

और वो मुर्दे जगाने में लगे हैं



सच की बातों का ज़माना लद गया

झूट की जय जय मनाने में लगे हैं



लाश गिन गिन कर हवादिस में वो,"आनन’

’वोट’ की कीमत लगाने में लगे हैं



-आनन्द-



ख़राश-ए-कफ़ =हथेली की खरोंच

हवादिस = हादिसा का बहुवचन

4 टिप्‍पणियां:

योगेश स्वप्न ने कहा…

wah.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

वाह...बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
सूचनार्थ!

Reena Maurya ने कहा…

सच की बातों का ज़माना लद गया
झूट की जय जय मनाने में लगे हैं
लाश गिन गिन कर हवादिस में वो,"आनन’
’वोट’ की कीमत लगाने में लगे हैं
बहूत हि बढीया..गजल...

आनन्द पाठक ने कहा…

आ0 योगेश जी/शास्त्री जी और रीना जी

उत्साह् वर्धन के लिए आप सभी लोगो का बहुत बहुत धन्यवाद
सादर
आनन्द.पाठक