रविवार, 30 दिसंबर 2012

एक श्रद्धांजलि : हे अनामिके !

[आज 29 दिसम्बर 20012 ,वर्ष का अवसान. अवसान एक अनामिका का,एक दामिनी का एक निर्भया का....उसे नाम की ज़रूरत नहीं ..दरिंदों के वहशीपन की शिकार.....मुक्त हो गई ..ये शरीर छोड़ कर...चली गई ये दुनिया छोड़ कर.....और छोड़ गई पीछे कई सवाल ’...जवाब तलाशने कि लिए.....। उसी सन्दर्भ में एक श्रद्धांजलि गीत प्रस्तुत कर रहा हूं...]




श्रद्धांजलि : हे अनामिके !



आज अगर ख़ामोश रहे तो ....

नए वर्ष के नई सुबह का कौन नया इतिहास लिखेगा ?



श्वान-भेड़िए , सिंहद्वार पर आकर फिर ललकार रहे हैं

साँप-सपोले चलती ’बस’ में रह रह कर फुँफकार रहे हैं

हर युग में दुर्योधन पैदा ,हर युग में दु:शासन ज़िंदा

द्रुपद सुता का चीर हरण ये करते बारम्बार रहे हैं



आज अगर ख़ामोश रहे तो ......

गली गली में दु:शासन का फिर कैसे संत्रास मिटेगा ?



जनता उतर चुकी सड़कों पर अब अपना प्रासाद संभालो !

चाहे आंसू गोले छोड़ो ,पानी की बौछार चला लो

कोटि कोटि कंठों से निकली नहीं दबेंगी ये आवाज़ें

चाहे लाठी चार्ज़ करा दो ’रैपिड एक्शन फ़ोर्स’ बुला लो



आज अगर ख़ामोश रहे तो ....

सत्ता की निर्ममता का फिर कौन भला विश्वास करेगा ?



हे अनामिके ! व्यर्थ तेरा वलिदान नहीं हम जाने देंगे

जली हुई कंदील नहीं अब बुझने या कि बुझाने देंगे

इस पीढ़ी पर कर्ज़ तुम्हारा शायद नहीं चुका पायेंगे

लेकिन फूल तुम्हारे शव का कभी नहीं मुरझाने देंगे



आज अगर ख़ामोश रहे तो .....

आने वाले कल का बोलो कौन नया आकाश रचेगा ?

कौन नया इतिहास लिखेगा ?



-आनन्द.पाठक-

09413395592

7 टिप्‍पणियां:

yashoda agrawal ने कहा…

आपकी यह बेहतरीन रचना बुधवार 02/01/2013 को http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जाएगी. कृपया अवलोकन करे एवं आपके सुझावों को अंकित करें, लिंक में आपका स्वागत है . धन्यवाद!

शारदा अरोरा ने कहा…

sach kaha hai ...

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल सोमवार (31-112-2012) के चर्चा मंच-1110 (साल की अन्तिम चर्चा) पर भी होगी!
सूचनार्थ!
--
कभी-कभी मैं सोचता हूँ कि चर्चा में स्थान पाने वाले ब्लॉगर्स को मैं सूचना क्यों भेजता हूँ कि उनकी प्रविष्टि की चर्चा चर्चा मंच पर है। लेकिन तभी अन्तर्मन से आवाज आती है कि मैं जो कुछ कर रहा हूँ वह सही कर रहा हूँ। क्योंकि इसका एक कारण तो यह है कि इससे लिंक सत्यापित हो जाते हैं और दूसरा कारण यह है कि पत्रिका या साइट पर यदि किसी का लिंक लिया जाता है उसको सूचित करना व्यवस्थापक का कर्तव्य होता है।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Saras ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

बलात्कार व हत्या रोकने के लिए समाज की सोच को बदलना बुनियादी शर्त है
दामिनी जैसे घिनौने अपराधों में सिर्फ़ नेता और पुलिस को दोष देकर समाज को निरपराध नहीं माना जा सकता। बलात्कार और हत्या हमारे समाज का कल्चर है, अब से नहीं है बल्कि शुरू से ही है। तब न तो नेता होते थे और न ही पुलिस। तब क्या कारण थे ?
इसी देश में औरत को विधवा हो जाने पर सती भी किया जाता था लेकिन अब नहीं किया जाता। इसका मतलब, जिस बात में समाज की सोच बदल गई, वह घिनौना अपराध भी बंद हो गया। बलात्कार और हत्या अभी तक जारी हैं तो इसका मतलब यह है कि इस संबंध में समाज की सोच नहीं बदली है।
दुनिया के तमाम देशों पर नज़र डालकर देखना चाहिए कि किस देश में बलात्कार और हत्या के जुर्म सबसे कम होते हैं ?
उस देश में कौन सी नैतिक, आध्यात्मिक, सामाजिक, आर्थिक और वैधानिक व्यवस्था काम करती है। उसके बारे में अपने देशवासियों को जागरूक करके हम अपने समाज की सोच बदल सकते हैं और उसे अपनाकर इन घिनौने अपराधों को रोका जा सकता है।

Madan Saxena ने कहा…

बहुत खूब , शब्दों की जीवंत भावनाएं... सुन्दर चित्रांकन
कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |
http://madan-saxena.blogspot.in/
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http://mmsaxena69.blogspot.in/

Madan Saxena ने कहा…



वाह . बहुत उम्दा,सुन्दर व् सार्थक प्रस्तुति
कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |
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