रविवार, 10 फ़रवरी 2013

एक ग़ज़ल 38 : बदली हुई है आप की

बह्र-ए-मुज़ारे’ मुसम्मन अख़रब मक्फ़ूफ़ महज़ूफ़
मफ़ऊलु---फ़ाइलातु---मुफ़ाईलु--फ़ाइलुन
221---------2121-------1221-------2122
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ग़ज़ल 38 : बदली हुई है आप की---

बदली हुई है आप की जो चाल-ढाल  है
लगता हर एक बात में कुछ गोलमाल है

दो-चार साल से हैं उसी मोड़ पे खड़े
’सबका विकास’ हो रहा उनका ख़याल है

दरबार में झुका भी तो कालीन सा बिछा
उस को गुमान ये है कि वो बाकमाल है

शाही कबाब मुर्ग मुसल्लम डकार  कर
फिर पूछते हैं देश का क्या हाल चाल है?

जाने हमारे दौर के लोगों को क्या  हुआ
जो तरबियत में आ गया इतना जवाल है

ये बात कम नहीं है कि ज़िन्दा है आदमी
हर आदमी के सामने कितना  सवाल है

 ’आनन’ उमीद रख अभी सब कुछ नहीं लुटा
फिर से उठा कि सामने रख्खी  मशाल है

-आनन्द पाठक-

[सं 27-10-18]

1 टिप्पणी:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
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आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल सोमवार (11-02-2013) के चर्चा मंच-११५२ (बदहाल लोकतन्त्रः जिम्मेदार कौन) पर भी होगी!
सूचनार्थ.. सादर!