रविवार, 10 फ़रवरी 2013

एक ग़ज़ल : बदली हुई है आप की



बदली हुई है आप की जो चाल-ढाल है

लगता है क्यों हर बात में ही गोल-माल है ?



उनकी नज़र में ’वोट’ से ज़्यादा नहीं था मैं

उतना ही मेरी मौत का उनको मलाल है



कल तक हमारे क़त्ल में ज़ाहिर शरीक थे

वो रहनुमा हैं बन गए सचमुच कमाल है



खाते चिकन और मुर्ग हैं ,खाते डकारते

फिर पूछते हैं देश का क्या हाल-चाल है ?



ये बात भी तो कम नहीं ज़िन्दा है आदमी

हर आदमी के सामने कितना सवाल है



’आनन’ तुम्हारे दौर के लोगों को क्या हुआ ?

जो तर्बियत में आजकल इतना ज़वाल है



-आनन्द.पाठक

09413395592



तर्बियत = पालन-पोषण ,संस्कार

ज़वाल = पतन .क्षरण

1 टिप्पणी:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
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आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल सोमवार (11-02-2013) के चर्चा मंच-११५२ (बदहाल लोकतन्त्रः जिम्मेदार कौन) पर भी होगी!
सूचनार्थ.. सादर!