बुधवार, 13 फ़रवरी 2013

एक ग़ज़ल 39 : आप मुझको सामने पाते.....

ग़ज़ल 39 : आप मुझको साथ में पाते--
बह्र-ए-रमल मुसद्दस मक़्लूअ’ महज़ूफ़

2122---2122-----2-
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आप मुझको सामने  पाते
आसमाँ  से जो उतर आते

चाँद ,तारों ,ख़्वाब , वादों के
झुनझुने देकर न बहलाते

उँगलिया क्यों आप पर उठतीं
आइनों से जो न घबराते

और भी कितने मसाईल हैं
आप  हैं अनजान बन जाते

चाँदनी तो चार दिन की है
किसलिए हैं आप इतराते ?

साफ़ चेहरा अब कहाँ ढूँढू
सब रंगे चेहरे नज़र आते ?

बस यही आदत बुरी ’आनन’
दर्द अपने क्यों छुपा जाते ?

-आनन्द.पाठक-
[सं 27-10-18]





1 टिप्पणी:

दिलबाग विर्क ने कहा…

आपकी पोस्ट 14 - 02- 2013 के चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है
कृपया पधारें ।