बुधवार, 13 फ़रवरी 2013

एक ग़ज़ल : तुम प्रतीक्षारत हमें पाते.....

तुम प्रतीक्षारत हमें पाते
जो धरातल पर उतर आते

गाँव की मिट्टी लगे सोधीं
यूं अगर जड़ से न कट जाते

चाँद पे क्या बस्तियाँ होतीं !
तुम हमारे घर चले आते

चाँदनी तो चार दिन की है
बात इतनी सी समझ जाते

आँसुओं में दर्द की गाथा
क्यों छुपा कर तुम निकल जाते

हम प्रवासी हों भले ’आनन’
दिल वतन में छोड़ कर आते

-आनन्द.पाठक
09413395



1 टिप्पणी:

दिलबाग विर्क ने कहा…

आपकी पोस्ट 14 - 02- 2013 के चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है
कृपया पधारें ।