गुरुवार, 28 मार्च 2013

एक ग़ज़ल : क्या करेंगे आप से हम याचनायें...

ग़ज़ल : क्या करेंगे आप से हम ....




क्या करेंगे आप से हम याचनाएं

मर चुकी जिनकी सभी संवेदनाएं



जो मिले अनुदान रिश्वत में बँटे है

फ़ाइलों में चल रही परियोजनाएं



रोशनी के नाम दरवाजे खुले हैं

हादसों की बढ़ गई संभावनाएं



पत्थरों के शहर में कुछ आइनें हैं

डर सताता है कहीं वो बिक न जाएं



आप की हर आहटें पहचानते हैं

जब कभी जितना दबे भी पाँव आएं



चाहता है जब कहे वो बात कोई

बेझिझक हम ’हाँ’ में उसकी ’हाँ’ मिलाएं



वो इशारों से नहीं समझेगा ’आनन’

जब तलक आवाज न अपनी बढ़ाएं



-आनन्द.पाठक

09413395592

शनिवार, 16 मार्च 2013

एक ग़ज़ल : कोई नदी जो उनके घर से....

एक ग़ज़ल : कोई नदी जो उनके....




कोई नदी जो उनके घर से गुज़र गई है

चढ़ती हुई जवानी पल में उतर गई है



बँगले की क्यारियों में पानी तमाम पानी

प्यासों की बस्तियों में सूखी नहर गई है



परियोजना तो वैसे हिमखण्ड की तरह थी

पिघली तो भाप बन कर जाने किधर गई है



हर बूँद बूँद तरसी मेरी तिश्नगी लबों की

आई लहर तो उनके आँगन ठहर गई है



"छमिया’ से पूछना था ,थाने बुला लिए थे

’साहब" से पूछना है ,सरकार घर गई है



वो आम आदमी है हर रोज़ लुट रहा है

क्या पास में है उसके सरकार डर गई है



ख़ामोश हो खड़े यूँ क्या सोचते हो "आनन’?

क्योंकर नहीं गये तुम दुनिया जिधर गई है ?



-आनन्द.पाठक

09413395592