शनिवार, 16 मार्च 2013

एक ग़ज़ल 41: कोई नदी जो उनके घर से....

एक ग़ज़ल : कोई नदी जो उनके....


221-2122     // 221---2122

कोई नदी जो उनके //घर से गुज़र गई है

चढ़ती हुई जवानी // पल में उतर गई है



बँगले की क्यारियों में // पानी तमाम पानी

प्यासों की बस्तियों में // सूखी नहर गई है



परियोजना तो वैसे //हिमखण्ड की तरह थी

पिघली तो भाप बन कर // जाने किधर गई है



हर बूँद बूँद तरसी // मेरी तिश्नगी लबों की

आई लहर तो उनके // आँगन ठहर गई है



"छमिया’ से पूछना था //,थाने बुला लिए थे

’साहब" से पूछना है //,सरकार घर गई है



वो आम आदमी है // हर रोज़ लुट रहा है

क्या पास में है उसके // सरकार डर गई है



ख़ामोश हो खड़े यूँ // क्या सोचते हो "आनन’?

क्योंकर नहीं गये तुम // दुनिया जिधर गई है ?



-आनन्द.पाठक



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