गुरुवार, 28 मार्च 2013

एक ग़ज़ल 42 : क्या करेंगे आप से हम याचनायें...

ग़ज़ल : क्या करेंगे आप से हम ....




2122---2122---2122

क्या करेंगे  आप से  हम याचनाएँ
लौट कर आनी सभी है जब सदाएँ

जो मिला अनुदान रिश्वत में बँटा है
फ़ाइलों में चल रहीं परियोजनाएँ

पत्थरों के शहर में कुछ आइने हैं
डर सताता है कहीं वो बिक न जाएँ

रोशनी के नाम दरवाजे खुले क्या
हादिसों की बढ़ गईं संभावनाएँ

चाहता है जो कहे,कुछ भी कहे ,वो
हर समय हम ’हाँ’ में उसकी ’हां’ मिलाएँ

आम जनता है बहुत कुछ देखती है
सब समझती है चुनावी गर्जनाएँ

वो इशारों में नहीं समझेगा ’आनन’
हैसियत जब तक नहीं उसकी बताएँ

-आनन.पाठक-

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