गुरुवार, 22 अगस्त 2013

एक ग़ज़ल : आप हुस्न-ओ-शबाब रखते हैं.....


आप हुस्न-ओ-शबाब रखते हैं
इश्क़ मेरे  भी  ताब रखते हैं
जान लेकर चलें हथेली  पे
हौसले इन्क़लाब  रखते  हैं
उनके दिल का हमें नहीं मालूम
हम दिल-ए-इज़्तिराब रखते हैं
जब भी उनके ख़याल में डूबे
सामने माहताब रखते  हैं
आप को जब इसे उठाना है
फिर क्यूँ रुख़ पे नकाब रखते हैं ?
मौसिम-ए-गुल कभी तो आयेगा
हम भी आँखों में ख़्वाब रखते हैं
अब तो बस,बच गया जमीर ’आनन
आज भी आब-ओ-ताब रखते हैं
शब्दार्थ
दिल-ए-इज़्तिराब = बेचैन दिल

मौसिम-ए-गुल  = बहार 

-आनन्द.पाठक
09413395592

2 टिप्‍पणियां:

ARUN SATHI ने कहा…

वाह वाह, जबरदस्त

मदन मोहन सक्सेना ने कहा…

बहुत खूब ,
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